कविता : द्रौपदी का चीर हरण

एक समय श्री कृष्ण जी संग अर्जुन करे विचार

लगा था पांडव का दरबार

एक समय श्री कृष्ण संग अर्जुन करें विचार

लगा था पांडव का दरबार

द्रौपदी का रचा स्वयंवर बड़े-बड़े पहुंचे थे धुरंधर

आए थे पूरे सजधजकर धनुष्यबाण रथ अपने लेकर

बड़े बड़े वहां योद्धा आए बड़े बड़े सरदार

लगा था पांडव का दरबार लगा था पांडव का दरबार

एक समय श्री कृष्ण जी संग अर्जुन करें विचार

लगा था पांडव दरबार

द्रौपदी का चीर हरण- Draupadi Cheer Haran Story in Hindi

स्वयंबर में दुर्योधन आया देख सभा को वह घबराया

आंगन टेढ़ा देख पाया पैर फिसल गया चकराए खाए

बढ़ा पेट बल बीच सभा में खा गया वह पछाड़ लगा था

पांडव दरबार लगा था पांडव दरबार

एक समय श्री कृष्ण जी अर्जुन करें विचार लगा था पांडव दरबार

दुर्योधन की  मति गई मारी ढीली पड़ गई अकड़ सारी

हंसने लगी महल में नारी हंसने लगे सब दरबारी

द्रोपती हंस कर बोली इनका है परिवार लगा था पांडवों दरबार लगा था पांडव दरबार

एक समय की बात है श्रीकृष्ण संग अर्जुन करें विचार लगा था पांडवों दरबार

दुर्योधन गुस्सा या मन में लगी आग लगी थी उसके तन में

पांडव सबको भेजूं बन में द्रोपती को रखूंगा संग में

चला गया दुर्योधन वहां से मन में कुटिल ता धार

लगा था पांडव दरबार लगा था पांडव दरबार

एक समय की बात है कृष्ण संग अर्जुन करें विचार लगाता पांडव दरबार

चल कर अपने महल में आया मामा शकुनि को बुलवाया

चल कर अपने महल में आया मामा शकुनी को बुलवाया

मामा भांजा रची यह माया जुआ का फिर खेल रचाया

जुआ बीच सब लगे खेलने पांडव गए हार

लगा था पांडव दरबार

सुखनी की यह चाल थी झूठी झूठी पांडव की सब माया लूटी

एक पल में ही किस्मत फूटी महल खजाना नगरी छुट्टी

दुर्योधन तब गरज के बोला लोवो इसकी नारी

लगा था पांडवों दरबार लगा था पांडव दरबार

जुआ बीच में द्रोपती आई बैठे थे वह पांचों भाई

सभा बीच में लाज गमाई किसी को शम दया नहीं आई

भीष्म पितामह लाखों योद्धा हो गए सब लाचार

लगा था पांडव दरबार लगा था पांडव दरबार

एक समय की बात है श्रीकृष्ण संग अर्जुन करें विचार लगा था पांडव दरबार

दुशासन उठ चला अकड़ के द्रोपती का वह केस पकड़कर

सभा बीच में खड़ी यू करके लगा खींचने साड़ी धड़के

धरती डोले अंबर डोले डोल उठा संसार लगा था जब पांडव दरबार लगा था जब पांडव दरबार

दौपति खड़ी रुदन  मचावे कौन मेरी अब लाज बचावे

हरि हरि कीर्तन लगावे छोड़ गुरुड को भगवन आवे चीर बड़ा व न लगे ….

श्याम जब आवे अंत पार लगा था पांडवों दरबार लगा था पांडव दरबार

एक समय की बात है श्रीकृष्ण संग करें अर्जुन विचार लगा था पांडवों दरबार

कूट वचन कभी मत बोलो इसमें विश को कभी ना खोलो

पहले अपने वचन को तोलो फिर अपने इस मुख को खोलो

द्रोपती के बस एक बोल से छूटे गया  घर बार लगा था पांडव का दरबार लगा था

एक समय की बात है श्रीकृष्ण संग अर्जुन करें विचार

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