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जब कर्ण ने जाना कि मैं पांडवों का बड़ा भाई हूं तब...

महाभारत का युद्घ संसार का प्रथम विश्व युद्घ था। उससे पूर्व दसराज्ञ का युद्ध हुआ था। उसी काल में सहस्त्रबाहु -परशुराम और फिर राम-रावण का युद्ध भी हुआ, लेकिन महाभारत को सबसे भीषण युद्ध माना गया जिसमें परमाणु अस्त्रों का भी उपयोग किया गया था। ऐसा माना जाता है कि उसी युद्ध के कारण हड़प्पा सभ्यता नष्ट हो गई थी।
यह युद्ध 18 दिन चला था और 18 अक्षौहिणी ही सेना ने इसमें भाग लिया था। एक अक्षौहिणी सेना में एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास सैनिक 65610 घुड़सवार 21870 रथ और 11870 हाथी होते थे। इस प्रकार 47,23,920 पैदल सैनिकों को इस युद्घ में अपना प्राणोत्सर्ग करना पड़ा था। इस युद्ध के बाद भारत के जनमानस में हिंसा के प्रति द्वैष उत्पन्न हो गया था। समय का चक्र घूमा और भारत अहिंसा के मार्ग पर चल पड़ा, लेकिन अब समय का चक्र फिर से घूम रहा है।
 
जब पांडवों का वनवास और अज्ञातवास समाप्त हो गया तब श्रीकृष्ण ने इस विनाशकारी युद्घ को टालने के लिए विराट नगरी से पाण्डवों के दूत के रूप में चलकर हस्तिनापुर की सभा में आकर पांडवों के लिए दुर्योधन से पांच गांव मांगे।
 
ये पांच गांव थे- इंद्रप्रस्थ (दिल्ली), वृकप्रस्थ (बागपत), जयंत (जानसठ) वारणावृत (बरनावा) और पांचवां गांव दुर्योधन की इच्छा से मांगा गया था। लेकिन जब दुर्योधन ने कह दिया कि बिना युद्घ के तो सुई की नोंक के बराबर भी भूमि नहीं दी जाएगी तो श्रीकृष्ण युद्घ को अवश्यंभावी मानकर वापिस चल दिए थे।
 
उस समय हस्तिनापुर से बाहर बहुत दूर तक छोड़ने के लिए श्रीकृष्ण के साथ कर्ण आया था। उस एकांत में श्रीकृष्ण ने कर्ण को बता दिया था कि वह कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है। यह सुनकर कर्ण के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। वह आवाक् रह गया था। 
 
श्रीकृष्ण ने एक बार फिर कहा, हे कर्ण तुम कुंति के ज्येष्ठ पुत्र हो और तुम्हारे पिता सूर्यदेव हैं। इसलिए तुम्हें युद्घ में पांडवों का साथ देना चाहिए। कर्ण को इस सत्य का पता चला तो नीतिमर्मज्ञ कर्ण ने तब नीतिकार कृष्ण को जो कुछ कहा था, वह बड़ा ही मार्मिक है और उस दानवीर के प्रति श्रद्घा भाव पैदा करने वाला है।
उसने कहा- हे मधुसूदन मेरे और आपके बीच में जो ये गुप्त मंत्रणा हुई है, इसे आप मेरे और अपने बीच तक ही रखें क्योंकि- यदि
जानाति मां राजा धर्मात्मा संयतेन्द्रिय:।
कुन्त्या: प्रथमजं पुत्रं स राज्यं ग्रहीष्यति।। (उद्योगपर्व 24)
 
जितेन्द्रिय धर्मात्मा राजा युधिष्ठर यदि यह जान लेंगे कि मैं कुंती का बड़ा पुत्र हूं तो वे राज्य ग्रहण नहीं करेंगे। कर्ण ने आगे कहा था कि उस अवस्था में मैं उस समृद्घिशाली विशाल राज्य को पाकर भी दुर्योधन को ही सौंप दूंगा। मेरी भी यही कामना है कि इस भूमंडल के शासक युधिष्ठर ही बनें।
 
कर्ण की ये बातें सुनकर युद्घ के प्रारंभ के लिए श्रीकृष्णजी ने यहीं पर घोषणा कर दी:-
 
सर्वाधिवनस्फीत: फलवा माक्षिक:।
निष्यं को रसवत्तोयो नात्युष्ण शिविर: सुख:।।
 
सब प्रकार की औषधियों तथा फल फूलों से वन की समृद्घि बढ़ी हुई है, धान के खेतों में खूब फल लगे हुए हैं मक्खियां बहुत कम हो गई हैं। धरती पर कीचड़ का नाम भी नहीं है। जल स्वच्छ तथा सुस्वादु है। इस सुखद मास में (यदि युद्घ होता है तो) न तो बहुत गरमी है और न अत्यधिक सर्दी ही है। अत: इसी महीने में युद्घ होना उचित रहेगा।
 
कर्ण इतो गत्वा द्रोणं शांतनवं कृपम।
ब्रूया सौम्योअयं वत्र्तते मास: सुप्रापयवसेन्धन:।। (उद्योग पर्व 31)
 
अच्छा कर्ण! तुम यहां से जाकर आचार्य द्रोण, शांतनुनंदन भीष्म तथा कृपाचार्य से कहना कि यह सौम्य (मार्गशीर्ष=अगहन) मास चल रहा है। इसमें पशुओं के लिए घास तथा जलाने के लिए लकड़ी आदि सुगमता से मिल सकती है।
 
इस श्लोक से आगे तीसरे श्लोक में कृष्णजी ने कहा था कि आज से सातवें दिन के पश्चात अमावस्या होगी। उसके देवता इंद्र कहे गए हैं। उसी में युद्घ आरंभ किया जाए।...आज के अंग्रेजी मासों के अनुसार समझने के लिए 12 अक्टूबर को कृष्णजी ने युद्घ की यह तिथि घोषित की थी।
 
अब जब युद्घ आरंभ हुआ तो यह सर्वमान्य सत्य है कि भीष्म पितामह युद्घ के सेनापति दस दिन रहे थे। युद्घ 19 अक्टूबर से आरंभ हुआ और 28 अक्टूबर को भीष्म पितामह मृत्यु शैय्या पर चले गये। जब युद्घ समाप्त हुआ तो पांचों पांडवों और कृष्णजी ने भीष्म पितामह से उनकी मृत्यु शैय्या के पास जाकर उपदेश प्राप्त किया। युद्घ 19 अक्टूबर से आरंभ होकर 5 नवंबर तक (18 दिन) चला।
 
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