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इंक़लाब जिंदाबाद के साथ होगी 'भारत माता की जय!'

कभी-कभार कुछ लोग ऐसे काम कर जाते हैं की सारा देश उनके पीछे इकट्ठा हो जाता है। उनके बोलों को लगातार याद करता है। मानो इतना कर लेने भर से देश और दुनिया के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।
भारत माता की जय के साथ इंक़लाब जिंदाबाद का नारा भी 1929 वाले साल में कुछ ऐसा ही था। या यह कहें कि 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्', वाली बात गीता में बस भगवान उवाच न रह कर, सच हो जाए।
 
कुछ ऐसा ही बीसवीं सदी के दूसरे दशक में हुआ जब भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने दिल्ली की असेंबली में एक आवाज़ी बम फोड़ा (8 अप्रैल 1929)। बम का उद्देश्य केवल जोर से आवाज करना था, किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं। बस सरदार बहादुर सोभा सिंह के हाथ में कुछ खरोंचें आईं।
बम की अफरा-तफरी में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दर्शक दीर्घा से ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए कुछ पर्चे फेंक रहे थे। अगले दिन अखबारों में बस एक ही चर्चा थी: सोशलिस्ट विचार धारा के दो नौजवानों ने कुंभकर्णी सरकार की नींद खोल दी है। सरकार को साधारण भारतीयों की बात सुनने पर मजबूर कर दिया है। अखबारों ने यह भी बताया कि दोनों क्रांतिकारी 'इंक़लाब जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे।
 
यह इंक़लाबी नारा 1921 में अलीगढ़ में सर सैयद अहमद खान द्वारा स्थापित मोहमेदन ऐंग्लो ओरिएंटल कॉलेज से पढ़े हुए, मशहूर शायर हसरत मोहानी ने मुस्लिम लीग के सालाना जलसे में, आजादी-ए-कामिल (पूर्ण आजादी) की बात करते हुए दिया था। यह वह समय था जब स्वतंत्रता आंदोलन जोरों पर था और गांधीजी ने लोगों को एक साल में पूर्ण आजादी का आश्वासन दिया था।
 
कुछ ही महीनों में आंदोलन वापस ले लिया गया। झुंझलाए हुए लोग इंक़लाब की बात भूलकर सांप्रदायिक नारे लगाते हुए एक-दूसरे को ढूंढ-ढूंढ कर कत्ल करने लगे।
किशोर भगत सिंह यह सब देख कर मानो विस्मित हो गया। वे लोग जो कल तक एक-दूसरे के साथ मिल कर 'भारत माता की जय' के नारे लगाते हुए अंग्रेज़ों के खिलाफ खड़े थे अचानक एक-दूसरे के खून के प्यासे कैसे हो गए? और वह भी साम्प्रदायिकता के आधार पर! जिससे हर किसी का केवल नुकसान होता है, लोग बंट जाते हैं, उनकी असली समस्याओं का हल भी नहीं निकलता, बस विदेशी सरकार का हाथ मजबूत होता है।
 
कौमी नारों से होने वाला नुकसान दिख चुका था। लोगों को एक नई दिशा देना जरूरी था। नतीजतन नौजवान भारत सभा के साथियों ने तय किया कि 'भारत माता की जय' के साथ-साथ 'इंक़लाब जिंदाबाद' भी उनका नारा होगा। उनका मानना था कि बगैर इंक़लाब के लोग सांप्रदायिकता के जाल में फंस जाएंगें।
 
असेंबली बम कांड में लगे नारों ने देश को झकझोर दिया। इसके बाद देश भर में 'भारत माता की जय' और 'इंक़लाब जिंदाबाद' के नारे लगने लगे। कौमी नारे और कौमी बैर को लोगों ने ताक पर रख दिया। एक होकर अंग्रेजों के खिलाफ फिर खड़े हो गए।
 
आने वाले चार सालों तक लगभग रोज अखबारों में भगत सिंह और उनके साथियों के कारनामों की चर्चा रहती। और हर खबर के साथ लोगों का निश्चय दृढ़ हो जाता: भारत में कौमी नारों का कोई स्थान नहीं है, 'भारत माता की जय', 'इंक़लाब जिंदाबाद' के साथ ही होगी।
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