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प्रभु श्रीराम से जुड़े 10 चौंकाने वाले रहस्य - Parbhu Shri Ram Se Judhe 10 Chokane Wale Rahashya

Parbhu Shri Ram Se Judhe 10 Chokane Wale Rahashya :-

शिव, राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध और नानक के बिना भारत उस शरीर की तरह है जिसमें कोई आत्मा नहीं। सिर्फ एक राम को निकाल देने से भारत का संपूर्ण धर्म और संस्कृति मरुस्थल की तरह हो जाता है। यही कारण है कि पिछले सैंकड़ों वर्षों से प्रभु श्रीराम और उसने जुड़े तथ्‍यों पर लगातार हमले होते रहे हैं, लेकिन अंत में जीत धर्म की ही होगी। यह आलेख पढ़कर आपको निश्चित ही आत्म संतुष्टि होगी।




  

कुछ लोग कहते हैं कि राम भगवान नहीं थे, वे तो राजा थे। कुछ का मानना है कि वे एक का‍‍ल्पनिक पात्र हैं। वे कभी हुए ही नहीं। वर्तमान काल में राम की आलोचना करने वाले कई लोग मिल जाएंगे। राम के खिलाफ तर्क जुटाकर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। इन पुस्तक लिखने वालों में वामपंथी विचारधारा और धर्मांतरण करने वाले लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है। तर्क से सही को गलत और गलत को सही सिद्ध किया जा सकता है। तर्क की बस यही ताकत है। तर्क वेश्याओं की तरह होते हैं। ये तर्कबाज लोग सभी नफरत के रावण हैं। रावण का अंत तय है।




नहीं किया था राम ने सीता का परित्याग : पहले रामायण 6 कांडों की होती थी, उसमें उत्तरकांड नहीं होता था। फिर बौद्धकाल में उसमें राम और सीता के बारे में सच-झूठ लिखकर उत्तरकांड जोड़ दिया गया। उस काल से ही इस कांड पर विद्वानों ने घोर विरोध जताया था, लेकिन इस उत्तरकांड के चलते ही साहित्यकारों, कवियों और उपन्यासकारों को लिखने के लिए एक नया मसाला मिल गया और इस तरह राम धीरे-धीरे बदनाम होते गए। इसी उत्तरकांड को तुलसीदास ने लव-कुश कांड नाम से लिखा और कहानी को और विस्तार दिया।

 

नहीं किया था राम ने सीता का परित्याग : सीता 2 वर्ष तक रावण की अशोक वाटिका में बंधक बनकर रहीं लेकिन इस दौरान रावण ने सीता को छुआ तक नहीं। इसका कारण था कि रावण को स्वर्ग की अप्सरा ने यह शाप दिया था कि जब भी तुम किसी ऐसी स्त्री से प्रणय करोगे, जो तुम्हें नहीं चाहती है तो तुम तत्काल ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे अत: रावण किसी भी स्त्री की इच्छा के बगैर उससे प्रणय नहीं कर सकता था। 
सीता को मु‍क्त करने के बाद समाज में यह प्रचारित है कि अग्निपरीक्षा के बाद राम ने प्रसन्न भाव से सीता को ग्रहण किया और उपस्थित समुदाय से कहा कि उन्होंने लोक निंदा के भय से सीता को ग्रहण नहीं किया था। किंतु अब अग्निपरीक्षा से गुजरने के बाद यह सिद्ध होता है कि सीता पवित्र है, तो अब किसी को इसमें संशय नहीं होना चाहिए। लेकिन इस अग्निपरीक्षा के बाद भी जनसमुदाय में तरह-तरह की बातें बनाई जाने लगीं, तब राम ने सीता को छोड़ने का मन बनाया। यह बात उत्तरकांड में लिखी है। यह मूल रामायण में नहीं है।

वाल्मीकि रामायण, जो निश्‍चित रूप से बौद्ध धर्म के अभ्युदय के पूर्व लिखी गई थी, समस्त विकृतियों से अछूती है। इसमें सीता परित्याग, शम्बूक वध, रावण चरित आदि कुछ भी नहीं था। यह रामायण युद्धकांड (लंकाकांड) में समाप्त होकर केवल 6 कांडों की थी। इसमें उत्तरकांड बाद में जोड़ा गया। कालिदास, भवभूति जैसे कवि सहित अनेक भाषाओं के रचनाकारों सहित 'रामचरित मानस' के रचयिता ने भी भ्रमित होकर उत्तरकांड को लव-कुश कांड के नाम से लिखा। इस तरह राम की बदनामी का विस्तार हुआ।
शोधकर्ता कहते हैं कि हमारे इतिहास की यह सबसे बड़ी भूल थी कि बौद्धकाल में उत्तरकांड लिखा गया और इसे वाल्मीकि रामायण का हिस्सा बना दिया गया। हो सकता है कि यह उस काल की सामाजिक मजबूरियां थीं, लेकिन सच को इस तरह बिगाड़ना कहां तक उचित है? सीता ने न तो अग्निपरीक्षा दी और न ही पुरुषोत्तम राम ने उनका कभी परित्याग ही किया। 
विपिन किशोर सिन्हा ने एक छोटी शोध पुस्तिका लिखी है जिसका नाम है- 'राम ने सीता-परित्याग कभी किया ही नहीं।' यह किताब संस्कृति शोध एवं प्रकाशन वाराणसी ने प्रकाशित की है। इस किताब में वे सारे तथ्‍य मौजूद हैं, जो यह बताते हैं कि राम ने कभी सीता का परित्याग नहीं किया। 
रामकथा पर सबसे प्रामाणिक शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के का स्पष्ट मत है कि 'वाल्मीकि रामायण का 'उत्तरकांड' मूल रामायण के बहुत बाद की पूर्णत: प्रक्षिप्त रचना है।' (रामकथा उत्पत्ति विकास- हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग प्रयाग विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1950)
  

प्रभु श्रीराम राजा या भगवान : हिन्दू धर्म के आलोचक खासकर 'राम' की जरूर आलोचना करते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि 'राम' हिन्दू धर्म का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है। इस स्तंभ को गिरा दिया गया तो हिन्दुओं को धर्मांतरित करना और आसान हो जाएगा। इसी नी‍ति के चलते तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर 'राम' को एक सामान्य पुरुष घोषित करने की साजिश की जाती रही है। वे कहते हैं कि राम कोई भगवान नहीं थे, वे तो महज एक राजा थे। उन्होंने समाज और धर्म के लिए क्या किया? वे तो अपनी स्त्री के लिए रावण से लड़े और उसे उसके चंगुल से मुक्त कराकर लाए। इससे वे भगवान कैसे हो गए?
भगवान राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा गया है अर्थात पुरुषों में सबसे श्रेष्ठ उत्तम पुरुष। अपने वनवास के दौरान उन्होंने देश के सभी आदिवासी और दलितों को संगठित करने का कार्य किया और उनको जीवन जीने की शिक्षा दी। इस दौरान उन्होंने सादगीभरा जीवन जिया। उन्होंने देश के सभी संतों के आश्रमों को बर्बर लोगों के आतंक से बचाया। इसका उदाहरण सिर्फ रामायण में ही नहीं, देशभर में बिखरे पड़े साक्ष्यों में आसानी से मिल जाएगा। भगवान राम भारत निर्माता थे। उन्होंने ही सर्वप्रथज्ञ भारत की सभी जातियों और संप्रदायों को एक सूत्र में बांधने का कार्य अपने 14 वर्ष के वनवान के दौरान किया था।
14 वर्ष के वनवास में से अंतिम 2 वर्ष को छोड़कर राम ने 12 वर्षों तक भारत के आदिवासियों और दलितों को भारत की मुख्य धारा से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया। शुरुआत होती है केवट प्रसंग से। इसके बाद चित्रकूट में रहकर उन्होंने धर्म और कर्म की शिक्षा दीक्षा ली। यहीं पर वाल्मीकि आश्रम और मांडव्य आश्रम था। यहीं पर से राम के भाई भरत उनकी चरण पादुका ले गए थे। चित्रकूट के पास ही सतना में अत्रि ऋषि का आश्रम था।
दंडकारण्य : अत्रि को राक्षसों से मुक्ति दिलाने के बाद वे दंडकारण्य क्षेत्र में चले गए, जहां आदिवासियों की बहुलता थी। यहां के आदिवासियों को बाणासुर के अत्याचार से मुक्त कराने के बाद वे 10 वर्षों तक आदिवासियों के बीच ही रहे। यहीं पर उनकी जटायु से मुलाकात हुई थी, जो उनका मित्र था। जब रावण सीता को हरण करके ले गया था, तब सीता की खोज में राम का पहला सामना शबरी से हुआ था। इसके बाद वानर जाति के हनुमान और सुग्रीव से।
वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।
इसी दंडकारण्य क्षेत्र में रहकर राम ने अखंड भारत के सभी दलितों को अपना बनाया और उनको श्रेष्ठ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा दी। भारतीय राज्य तमिलनाडु, महाराष्ट्र, अंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल, कर्नाटक सहित नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी राम इसीलिए जिंदा हैं। श्रीराम ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने धार्मिक आधार पर संपूर्ण अखंड भारत के दलित और आदिवासियों को एकजुट कर दिया था। इस संपूर्ण क्षेत्र के आदिवासियों में राम और हनुमान को सबसे ज्यादा पूजनीय इसीलिए माना जाता है। लेकिन अंग्रेज काल में ईसाइयों ने भारत के इसी हिस्से में धर्मांतरण का कुचक्र चलाया और राम को दलितों से काटने के लिए सभी तरह की साजिश की, जो आज भी जारी है। 
राम राजा नहीं भगवान : जब भी कोई अवतार जन्म लेता है तो उसके कुछ चिह्न या लक्षण होते हैं और उसके अवतार होने की गवाही देने वाला कोई होता है। राम ने जब जन्म लिया तो उनके चरणों में कमल के फूल अंकित थे, जैसा कि कृष्ण के चरणों में थे। राम के साथ हनुमान जैसा सर्वशक्तिमान देव को होना इस बात की सूचना है कि राम भगवान थे। रावण जैसा विद्वान और मायावी क्या एक सामान्य पुरुष के हाथों मारा जा सकता है? इन सबको छोड़ भी दें तो ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र ने इस बात की पुष्टि की कि राम सामान्य पुरुष नहीं, भगवान हैं और वह भी विष्णु के अवतार। इक्ष्वाकु वंश में एक नहीं, कई भगवान हुए उनमें से सबसे पहला नाम ऋ‍षभनाथ का आता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे।

शूद्र और राम : वैसे तो राम के काल में कोई ऊंचा या नीचा नहीं होता था। भगवान किसी जातिवर्ग के नहीं होते और न ही वे मनुष्य जाति में भेद करते हैं। रामायण काल में जातिगत जो भिन्नता थी वह मनुष्यों के रंग, रूप और आकार को लेकर थी। जैसे वानर, ऋक्ष, रक्ष और किरात जातियां मनुष्य से भिन्न थी। केवट, शबरी, जटायु, सुग्रीव और संपाति आदि से राम के संबंध दर्शाते हैं कि उस काल में ऐसी कोई जातिगत भावना नहीं थी, जो आज हमें देखने को मिलती है। हनुमानजी के गुरु मतंग ऋषि आज की जातिगत व्यवस्था अनुसार तो दलित ही कहलाएंगे?
श्रीराम ने 14 वर्ष वन में रहकर भारतभर में भ्रमण कर भारतीय आदिवासी, जनजाति, पहाड़ी और समुद्री लोगों के बीच सत्य, प्रेम, मर्यादा और सेवा का संदेश फैलाया। यही कारण रहा की श्रीराम का जब रावण से युद्ध हुआ तो सभी तरह की वनवासी और आदिवासी जातियों ने श्रीराम का साथ दिया।
श्रीरामचरित के संवाद नहीं है श्रीराम के वचन : यह तुलसीदासजी ने श्रीरामचरित मानस में लिखा- 'ढोल गवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।' ऐसा श्रीश्रीराम ने कभी नहीं कहा। यदि रामानंद सागर कोई रामायण लिखते हैं और वे अपनी इच्छा से जब श्रीराम के डॉयलाग लिखते हैं, तो इसका यह मतलब तो नहीं लगाना चाहिए कि ऐसा श्रीराम ने बोला है। तुलसीदास द्वारा लिखे गए इस एक वाक्य के कारण श्रीराम की बहुत बदनामी हुई। कोई यह नहीं सोचता कि जब कोई लेखक अपने तरीके से रामाय
ण लिखता है तो उस समय उस पर उस काल की परिस्थिति और अपने विचार ही हावी रहते हैं।

श्रीराम की जल समाधि : श्रीराम द्वारा जल समाधि लेने की घटना को हिन्दू दलितों का धर्मान्तरण करने वाले आलोचकों ने आत्महत्या करना बताया। मध्यकाल में ऐसे बहुत से साधु हुए हैं जिन्होंने जिंदा रहते हुए सभी के सामने धीरे-धीरे देह छोड़ दी और फिर उनकी समाधि बनाई गई। राजस्थान के महान संत बाबा रामदेव (रामापीर) ने जिंदा समाधि ले ली थी, तो क्या हम यह कहें कि उन्होंने आत्महत्या कर ली?
अयोध्या आगमन के बाद राम ने कई वर्षों तक अयोध्या का राजपाट संभाला और इसके बाद गुरु वशिष्ठ व ब्रह्मा ने उनको संसार से मुक्त हो जाने का आदेश दिया। एक घटना के बाद उन्होंने जल समाधि ले ली थी।

सरयू नदी में श्रीराम ने जल समाधि ले ली थी। अश्विन पूर्णिमा के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अयोध्या से सटे फैजाबाद शहर के सरयू किनारे जल समाधि लेकर महाप्रयाण किया। श्रीराम ने सभी की उपस्थिति में ब्रह्म मुहूर्त में सरयू नदी की ओर प्रयाण किया उनके पीछे थे उनके परिवार के सदस्य भरत, शत्रुघ्न, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति।  ॐ का उच्चारण करते हुए वे सरयू के जल में एक एक पग आगे बढ़ते गए और जल उनके हृदय और अधरों को छूता हुआ सिर के उपर चढ़ गया।  
क्यों ली जल समाधि : यमराज यह जानते थे क‌ि भगवान की इच्छा के ब‌िना भगवान न तो स्वयं शरीर का त्याग करेंगे और न शेषनाग के अंशावतार लक्ष्मण जी। ऐसे में यमराज ने एक चाल चली। एक द‌िन यमराज क‌िसी व‌िषय पर बात करने भगवान राम के पास आ पहुंचे। भगवान राम ने जब यमराज से आने का कारण पूछा तो यमराज ने कहा क‌ि आपसे कुछ जरूरी बातें करनी है।
भगवान राम यमराज को अपने कक्ष में ले गए। यमराज ने कहा क‌ि मैं चाहता हूं क‌ि जब तक मेरी और आपकी बात हो उस बीच कोई इस कक्ष में नहीं आए।यमराज ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए क‌हा क‌ि अगर कोई बीच में आ जाता है तो आप उसे मृत्युदंड देंगे। भगवान राम ने यमराज की बात मान ली और यह सोचकर क‌ि लक्ष्मण उनके सबसे आज्ञाकारी हैं इसल‌िए उन्होंने लक्ष्मण जी को पहरे पर बैठा द‌िया।यमराज और राम जी की बात जब चल रही थी उसी समय दुर्वसा ऋष‌ि अयोध्या पहुंच गए और राम जी से तुरंत म‌िलने की इच्छा जताई। लक्ष्मण जी ने कहा क‌ि भगवान राम अभी यमराज के साथ व‌िशेष चर्चा कर रहे हैं। भगवान की आज्ञा है क‌ि जब तक उनकी बात समाप्त नहीं हो जाए कोई उनके कक्ष में नहीं आए। इसल‌िए आपसे अनुरोध है क‌ि आप कुछ समय प्रतीक्षा करें।
ऋष‌ि दुर्वसा लक्ष्मण जी की बातों से क्रोध‌ित हो गए और कहा क‌ि अभी जाकर राम से कहो क‌ि मैं उनसे म‌िलना चाहता हूं अन्यथा मैं पूरी अयोध्या को नष्ट होने का शाप दे दूंगा। लक्ष्मण जी ने सोचा क‌ि उनके प्राणों से अध‌िक महत्व उनके राज्य और उसकी जनता का है इसल‌िए अपने प्राणों का मोह छोड़कर लक्ष्मण जी भगवान राम के कक्ष में चले गए।भगवान राम लक्ष्मण को सामने देखकर हैरान और परेशान हो गए। भगवान राम ने लक्ष्मण से पूछा क‌ि यह जानते हुए भी क‌ि इस समय कक्ष में प्रवेश करने वाले को मृत्युदंड द‌िया जाएगा, तुम मेरे कक्ष में क्यों आए हो।
लक्ष्मण जी ने कहा क‌ि दुर्वसा ऋष‌ि आपसे अभी म‌िलना चाहते हैं। उनके हठ के कारण मुझे अभी कक्ष में आना पड़ा है। राम जी यमराज से अपनी बात पूरी करके जल्दी से ऋष‌ि दुर्वासा से म‌िलने पहुंचेयमराज अपनी चाल में सफल हो चुके थे। राम जी से यमराज ने कहा क‌ि आप अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण को मृत्युदंड दीज‌िए। भगवान राम अपने वचन से मजबूर थे। रामजी सोच में थे क‌ि अपने प्राणों से प्र‌िय भाई को कैसे मृत्युदंड द‌‌िया जाए।
राम जी ने अपने गुरू वश‌िष्‍ठ जी से इस व‌िषय में बात की तो गुरू ने बताया क‌ि अपनों का त्‍याग मृत्युदंड के समान ही होता है। इसल‌िए आप लक्ष्मण को अपने से दूर कर दीज‌िए यह उनके ल‌िए मृत्युदंड के बराबर ही सजा होगी।जब राम जी ने लक्ष्मण को अपने से दूर जाने के ल‌िए कहा तो लक्ष्मण जी ने कहा क‌ि आपसे दूर जाकर तो मैं यूं भी मर जाऊंगा। इसल‌िए अब मेरे ल‌िए उच‌ित है क‌ि मैं आपके वचन की लाज रखूं। लक्ष्मण जी भगवान राम को प्रणाम करके राजमहल से चल पड़े और सरयू नदी में जाकर जल समाध‌ि ले ली। इस तरह राम और लक्ष्मण दोनों ने अपने-अपने वचनों और कर्तव्य का पालन क‌िया। इसल‌िए कहते ‘रघुकुल र‌ित‌ि सदा चल‌ि आई। प्राण जाय पर वचन न जाई।………………….


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