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विज्ञान वरदान या अभिशाप - Vigyan Vardan ya Abhishaap

science blessing or a curse के लिए चित्र परिणाम
शुरु में किसी विज्ञान उन्‍नति, वैज्ञानिक प्रगति का उद्देश्‍य यदि मानव कल्‍याण होता है लेकिन कालान्‍तर में सम्‍पूर्ण विज्ञानोन्‍नति विनाश लीला रचने पर स्थिर हो जाती है। दुनिया के देशों के सत्‍ता प्रतिष्‍ठान अपने यहां अनेक तरह की सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, सांस्‍कृतिक, सामरिक व्‍यवस्‍थाएं संभालने के लिए जिस कानूनी प्रणाली का अनुसरण करते हैं, उसका शुरुआती असर लगातार नहीं बना रहता। परिणामस्‍वरुप सभी क्षेत्रों की व्‍यवस्‍था में एक प्रकार की शिथिलता हावी होती जाती है। इसके बाद व्‍यवस्‍थागत कार्य इन्‍हें करनेवालों की चित्‍तवृत्ति, ईमानदारी, बेईमानी के आधार पर सम्‍पन्‍न होते हैं। यदि बेईमान कर्मचारी-अधिकारी ज्‍यादा होंगे, उनके पास अधिक शासकीय अधिकार होंगे तो निश्चित है सेवाओं, वस्‍तुओं, मशीनों के स्‍थापित प्रयोग उद्देश्‍य इनके बलबूते, इनकी मानसिकता से तय होंगे। दुर्भाग्‍य से आज सम्‍पूर्ण दुनिया में ऐसे ही नियन्‍ता स्‍थापित हैं। इन्‍हीं के पास राष्‍ट्राधिकार, क्षेत्राधिकार, विशेषाधिकार निहित हैं। वे इनका दुरुपयोग कर रहे हैं। इसी के दम पर आज आतंक, मतभेद, रक्‍तपात की बहुतायत है। 

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          विज्ञान वरदान है जब वह मनुष्‍य के पूरे जीवन को सुरक्षित करे। जब प्राकृतिक मृत्‍यु तक मानव सुखी, खुशहाल रहेगा तो ही वैज्ञानिक वरदान अभीष्‍ट है। यदि विज्ञान जीवन, मानवीय मनोविज्ञान के गूढ़तम रहस्‍य उजागर करने की दिशा में कार्यान्वित होता और इस प्रक्रिया में उसके दुरुपयोग को पूर्ण रूप से नियन्त्रित किया जाता तो निसन्‍देह वह स्‍तुत्‍य होता।
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लेकिन आज के विज्ञान आधारित जीवन पर दृष्टि डालें तो यह वरदान न्‍यून और अभिशाप अधिक दिखता है। मशीनों, उपकरणों, रोबोटिक यन्‍त्रों की वर्तमान दुनिया और लोग भावशून्‍य हो चले हैं। यातायात साधनों, संचार उपकरणों, घरेलू भौतिक वस्‍तुओं की परिधि में मानव मन-मस्तिष्‍क सामान्‍य मानुषिक व्‍यवहार और विचार करने योग्‍य भी नहीं बचे हैं। लोगों, सम्‍बन्धियों को परस्‍पर जोड़ने के लिए जिन चल-अचल दूरभाष यन्‍त्रों का आविष्‍कार हुआ आज उनका प्रयोग हिंसा, अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ाने में हो रहा है। सामान्‍य रुप से विचार करने पर तो यही लगता है कि आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, अन्‍य भौतिकीय यन्‍त्रों, उपकरणों के बिना जीवन चलाना कठिन है। लेकिन यदि हममें थोड़ा सा जीवन अनुराग, विवेक जागृत होता है तो हम सोचते हैं कि ये सब व्‍यर्थ हैं। 

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     विज्ञान, वैज्ञानिक गतिविधियां कालान्‍तर में केवल व़स्‍तु उपभोग, नकारात्‍मक प्रयोग में संलिप्‍त रहती हैं। वस्‍तुओं और सेवाओं की जो सौगात वैज्ञानिकों ने अपनी स्‍वलगन, अथाह परिश्रम से प्रस्‍तुत की उनका इस्‍तेमाल करनेवाले अवैज्ञानिक लोग कभी भी आविष्‍कारकों को साभार याद नहीं करते। या बहुत कम ऐसा करते हैं। तो ऐसे लोगों, ऐसे कृतघ्‍न मानवों के लिए आविष्‍कारकों द्वारा आविष्‍कारों की झड़ी लगाने की क्‍या जरूरत थी! प्राय: हर संवदेनशील मनुष्‍य देखता और महसूस करता है कि किस प्रकार आगे बढ़ने के खोखले सिद्धान्‍त के भरोसे चीजों के प्रयोक्‍ताओं के सिर पर अजीब भूत बैठा हुआ है।
     लिखते समय लेखक को अभिव्‍यक्ति की स्रोत भाषा और इसके आविष्‍कार, आविष्‍कारक पर क्‍या आश्‍चर्य नहीं करना चाहिए? विद्युत प्रकाश में अपनी रातों को देखनेवाला मनुष्‍य क्‍या इतना सोचने की फुर्सत निकालता है कि विद्युत प्रकाश का सृजन करनेवाला कितना महान था! जिस पेन से हम लिखते हैं उसकी वैज्ञानिक रचना और रचनाकार के बारे में कभी सोचते हैं हम! इसी प्रकार सभी अन्‍य चल-अचल वस्‍तुएं हैं, जिन्‍होंने हमारे जीवन को इतना सुगम कर दिया कि अब हममें से कई भ्रष्‍टों और दुष्‍टों ने इनके दुरुपयोग, अंधप्रयोग में अपनी रही-सही विचारशक्ति ही खो दी है। इस रूप में विज्ञान को अभिशाप कहना तर्कसंगत होगा। 

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कुछ लोग पुरानी बातों, जीवन को याद करनेवालों को पिछड़ेपन की संज्ञा देते हैं, पर क्‍या हमारा अस्तित्‍व हमसे पहले मनुष्‍य जीवन में अवतरित होनेवालों के बिना सम्‍भव हो सकता था! निसन्‍देह नहीं। तो क्‍यों कर कुछ लोगों के एकछत्र राज करने की गोपनीय राष्‍ट्रनीति और राजनीति के अन्‍तर्गत आगे-बढ़ना, विकास जैसे शब्‍दों को आम जनजीवन में प्रसारित किया गया! आखिर आगे बढ़ने का सही अर्थ क्‍या है! क्‍या हमारे पुरखे, वंशज हमसे बेहतर जीवन नहीं जीते थे? स्‍वास्‍थ्‍य, संस्‍कार, समाज, प्राकृतिक जीवनयापन के आधार पर जितना खुशहाल पहले का जीवन था, अब वैसा नहीं रहा। आज एक नवजात मानव शिशु को अगर गाय का शुद्ध दूध नहीं मिल पाता है तो ऐसी वैकासिक स्थिति का क्‍या लाभ! एक वृद्ध को अगर पारिवारिक संबल नहीं मिल पा रहा है, जो पुरातन संस्‍कृति की निष्‍पत्ति से संभाव्‍य था, तो ऐसे विकास की गति किसलिए! क्‍या मानव का जानवरों जैसा खुल्‍ला व्‍यवहार और प्रतिपल इसमें होनेवाली बढ़ोतरी ही तरक्‍की की परिभाषा है?
     कोई आविष्‍कारक किसी वस्‍तु को क्‍या सोच कर बनाता है? ये प्रश्‍न इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि वैज्ञानिक की सोच का प्रभाव उसके खोजे गए सिद्धान्‍त और निर्मित उपकरण में परिलक्षित होता है। और संसार की सहज गतिशीलता के लिए वैज्ञानिक के रूप में मानव की सोच तथा इसका प्रभाव उचित होना चाहिए। यदि विज्ञानी संवेदनशील है, उसे मानवीय भावनाओं की चिन्‍ता है तो निश्चित ही वह अपने वैज्ञानिक प्रयोग मानव-कल्‍याण विचार को केन्‍द्र में रख कर करेगा। इसके अतिरिक्‍त कई ऐसे विज्ञानविधाता हैं, जिनकी प्रयोगधर्मिता का लक्ष्‍य अपनी त्‍वरित लोकप्रियता, धनार्जन होता है। दुर्भाग्‍यवश आज के वैज्ञानिक, इनकी प्रयोगशालाएं इसी मानसिकता के सहारे आगे बढ़ रही हैं।
     माना कि कतिपय लोगों के लिए वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी उपकरण मोबाइल फोन परस्‍पर सम्‍पर्क साधने का बहुत अच्‍छा माध्‍यम है। लेकिन यह भी मानना होगा कि लोगों में स्‍वाभाविक जुड़ाव बचा ही कहां है। तब मोबाइल किसलिए? ऐसी कोई सरकारी सुविधा है नहीं कि हम सरकार के किसी संस्‍थान, व्‍यक्ति को मोबाइल से सम्‍पर्क करें और वह तुरन्‍त हमें सहायता उपलब्‍ध कराने आ पहुंचे। सरकारी चिकित्‍सालयों में रोगियों की भीड़ देख कर मन से यही प्रार्थना निकलती है कि हे भगवान कोई रोगग्रस्‍त ही न हो दुनिया में, विशेषकर भारत में। निजी चिकित्‍सालय विशेषज्ञ संस्‍थान बनने की महत्‍वाकांक्षा में रोगियों के लिए अत्‍यधिक असहनीय होते जा रहे हैं। चिकित्‍सा के अतिरिक्‍त शिक्षा क्षेत्र में भी बहुत सी समस्‍याएं हैं। जीवन से जुड़े अनेक क्षेत्र आज अपनी सेवाएं देने में अत्‍यन्‍त उलझ चुके हैं। सेवा लेनेवाले व्‍यक्ति कितनी कठिनाइयों में इन तक अपनी पहुंच बना पाते हैं, यह सोचकर ही रक्‍तचाप बढ़ने लगता है। 
     खाद्यान, खनिज सम्‍पन्‍न भारतीय ग्रामों की वैश्विक औद्योगिकीकरण के लिए बलि चढ़ा दी गई है। इस औद्योगिकीकरण से अरबों की जनसंख्‍या में से चयनित देशों के कुछ लाख लोग ही तो समस्‍त जीवन-सुविधाओं का नि:शुल्‍क भोग कर पाते हैं। शेष देश और उनके लोग तो औद्योगिकी की कच्‍ची सामग्री के रुप में परिवर्तित हो चुके हैं। तब विज्ञान के पक्ष में किस बात का सामूहिक प्रशंसा-गान हो रहा है! एक व्‍यक्ति, एक परिवार को जब अपने जीवन की प्रत्‍येक आवश्‍यकता के लिए अर्थ-प्रायोजित जटिल तन्‍त्र से समझौता करना पड़ रहा है तो तब तथाकथित प्रगति व प्रगतिवाद के मायने स्‍वयं ही झूठे सिद्ध हो जाते हैं। विज्ञान पक्ष भोंथरा प्रतीत होने लगता है। अन्‍त में आध्‍यात्मिक तत्‍व ही जीवन का पोषक तत्‍व सिद्ध होता है। विज्ञान तो आज अभिशाप के लिए ही तीव्रता से अग्रसर है।

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