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गुरु पूर्णिमा का महत्व | Guru Purnima Ka Mahatva In Hindi

Guru Purnima Ka Mahatva : आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है.  गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है.
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गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा.

 


Ashadh purnima | Guru Purnima Festival


वैसे तो कई धर्म होते है तथा हर धर्म के लोगो की अलग अलग मान्यता होती है. जैसे हिन्दू मंदिर जाते है, सिख्क गुरुद्वारे जाते है, तो मुस्लिम लोग मज्जिद जाते है तथा क्रिशन लोग चर्च जाते है |  इन लोगो के अपने धर्मो के देवी देवताओ को पूजने का अलग तरीका भी होता है, परंतु फिर भी एक ऐसी चीज भी है, जिन्हे ये सब एक साथ मानते तथा पूजते है “गुरु”. गुरु कोई भी हो सकता है एक संत महात्मा या कोई चर्च के फादर या कोई और एक साधारण से स्कूल कॉलेज मे पढाने वाला या वाली भी गुरु ही होते है| यह भी कहा जा सकता है कि विद्यालय  ही वह पहली जगह है, जहाँ एक बच्चा अपने जीवन मे पहली बार अपने जीवन के पहले गुरु से संपर्क मे आता है तथा विद्यालय  ही वह जगह है, जहा एक बच्चा अपने जीवन का प्रथम पाठ पढ़ता है.

 

प्राचीन काल मे कोई विद्यालय  कॉलेज नहीं होते थे, उस समय विद्यार्थी ऋषियों के आश्रम मे रहकर विद्या ग्रहण करते थे. उस समय किसी भी विद्यार्थी के जीवन का एक पहर उनके गुरुओ के आश्रम मे ही बीतता था, तो उनकी उनके गुरुओ के लिये एक अलग श्रद्धा तथा सम्मान होता था, तो वे आषाढ़ मास की पुर्णिमा को गुरु पुर्णिमा के रूप मे मानते थे तथा इस दिन गुरु पूजा का बड़ा महत्व था, तथा इस आषाढ़ मास की पुर्णिमा के दिन गुरु पूजा का विधान आज तक चला आ रहा है.

ज्ञान का मार्ग है गुरू पूर्णिमा | Guru Purnima - A path to wisdom

शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.

भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.

गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.

गुरु पूर्णिमा का महत्व के लिए चित्र परिणाम
 
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गुरू आत्मा - परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय.

गुरु वह व्यक्ति है जो ज्ञान की गंगा बहाता है तथा अपने शिष्यो को अंधकार से प्रकाश की और ले जाता है . प्राचीन काल मे जब शिष्य गुरु के आश्रम मे रहकर निशुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे, तो वे इसी दिन अपने गुरु को उनकी इच्छा अनुसार गुरु दक्षिणा देते थे तथा इस दिन को एक उत्सव की तरह मनाते थे. प्राचीन काल मे गुरु की आज्ञा भगवान का आदेश होती थी | इसके कई प्रमाण है परंतु सबसे अच्छा उदाहरण एकलव्य का है, जिसने गुरु द्रोण की मूर्ति रखकर शिक्षा गृहण की थी, परंतु फिर भी गुरु द्रोण के गुरु दक्षिणा मे दाए हाथ का अंगूठा मांगने पर बिना किसी संदेह के तुरंत अपना अंगूठा काटकर दे दिया था. हलाँकि आज गुरु की आज्ञा का पालन एकलव्य की तरह विरले ही कोई करता हो, परंतु गुरु पुर्णिमा के दिन उत्सव मनाने का यह रिवाज आज तक चला आ रहा है. गुरु पुर्णिमा के दिन कई पारंपरिक रूप से चल रहे संस्थानो मे आज भी गुरु का सम्मान किया जाता है, कई जगह इस दिन धार्मिक आयोजन किए जाते है | अपने गुरुओ के साथ पवित्र नदियो मे स्नान किया जाता है तथा कई जगह तो मेलो का आयोजन किया जाता है .
गुरु पूर्णिमा महत्व | Significance of Guru Purnima 

गुरु पूर्णिमा का महत्व के लिए चित्र परिणाम

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गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु को विष्णु कहा गया है क्योकि माँ के बाद वही है जो शिष्य को उच्च संस्कार देता है और उस का पालन पोषण करता है।, गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है.

गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है.

वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र  इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा है.


आप भी इस दिनों को अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर दो। और इस दिन को इस त्यौहार को बड़ी श्रद्धा और प्रेम के साथ अपने गुरु की शिक्षा को याद करते हुए बनाओ।
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