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श्री चैतन्य महाप्रभु अवतार | Sri Chaitanya Mahaprabhu Avatar In Hindi


चैतन्य महाप्रभु जीवन परिचय - Sri Chaitanya Mahaprabhu Avatar In Hindi :  भारतीय उपासना पद्धति में व्रत उत्सवों का बहुत महत्व है। शैव, वैष्णव सहित सभी उपासक इनको बहुत पवित्रता से आचरण में उतारते हैं। जिन-जिन आचार्यों ने उपासना पद्धतियों में जो कुछ भी विशेष उपलब्धियां प्राप्त की वह जन मानस में स्वीकार होती चली गईं।

चैतन्य महाप्रभु ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने भक्ति मार्ग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। भगवान्‌ श्री चैतन्य देव का आविर्भाव पूर्वबंग के अपूर्व धाम नवद्वीप में हुआ था। चौबीस वर्ष की अवस्था में लोककल्याण की भावना से संन्यास धारण किया, जब भारत वर्ष में चारों ओर विदेशी शासकों के भय से जनता स्वधर्म का परित्याग कर रही थी। तब चैतन्य महाप्रभु ने यात्राओं में हरिनाम के माध्यम से हरिनाम संकीर्तन का प्रचार कर प्रेमस्वरूपा भक्ति में बहुत बड़ी क्रांति फैला दी।
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संन्यास ग्रहण के पश्चात श्री चैतन्य ने दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान किया। उस समय दक्षिण में मायावादियों के प्रचार-प्रसार के कारण वैष्णव धर्म प्रायः संकीर्तन का प्रचार न करते तो यह भारत वर्ष वैष्णव धर्म विहीन हो जाता। 

चैतन्य महाप्रभु की जीवनी – Sri Chaitanya Mahaprabhu In Hindi

चैतन्य महाप्रभु के लिए चित्र परिणाम  
Sri Chaitanya Mahaprabhu Biography In Hindi

हरिनाम का स्थान-स्थान पर प्रचार कर चैतन्यदेव श्रीरंगम्‌ पहुंचे और वहां गोदानारायण की अद्भुत्‌ रूपमाधुरी देख भावावेश में नृत्य करने लगे। श्री चैतन्य का भाव-विभावित स्वरूप देख मंदिर के प्रधान अर्चक श्रीवेंकट भट्ट चमत्कृत हो उठे और भगवान की प्रसादी माला उनके गले में डाल दी तथा उन्हें बताया कि वर्षाकालीन यह चातुर्मास कष्ट युक्त, जल प्लावन एवं हिंसक जीव-जन्तुओं के बाहूल्य के कारण यात्रा में निषिद्ध है, अतः उनके चार मास तक अपने घर में ही निवास की प्रार्थना की।

श्रीवेंकट भट्ट के अनुरोध पर श्रीचैतन्य देव के चार मास उनके आवास पर व्यतीत हुए। उन्होंने पुत्र श्रीगोपाल भट्ट को दीक्षित कर वैष्णव धर्म की शिक्षा के साथ शास्त्रीय प्रमाणोंसहित एक स्मृति ग्रंथ की रचना का आदेश दिया।
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कुछ समय पश्चात श्रीगोपाल भट्ट वृंदावन आए एवं वहां निवास कर उन्होंने पंचरात्र, पुराण और आगम निगमों के प्रमाणसहित 251 ग्रंथों का उदाहरण देते हुए हरिभक्ति विलास स्मृति की रचना की। इस ग्रंथ में उन्होंने एकादशी तत्व विषय पर विशेष विवेचना की।

इस प्रसंग में आचार्य गौर कृष्ण दर्शन तीर्थ कहते हैं चातुः साम्प्रदायिक वैष्णवों के लिए आवश्यक रूप में एकादशी व्रत का महत्वपूर्ण स्थान है। एकादशी व्रत करने से जीवन के संपूर्ण पाप विनष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को सहस्रों यज्ञों के समान माना गया है।
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ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी तथा विधवा स्त्रियां भी एकादशी व्रत के अधिकारी हैं। एकादशी व्रत त्याग कर जो अन्न सेवन करता है, उसकी निष्कृति नहीं होती। जो व्रती को भोजन के लिए कहता है, वह भी पाप का भागी होता है।

 एक बंगाली आध्यात्मिक अध्यापक है जिन्होंने गुडिया वैष्णविस्म की स्थापना की थी। उनके अनुयायी उन्हें भगवान श्री क्रिष्ण का अवतार ही मानते थे और वे अपने अनुयाइयो के सामने उन्हें भक्ति और जीवन का पाठ पढ़ाते थे। उन्हें कृष्णा का सबसे सौभाग्यपूर्ण अविर्भाव माना जाता था।

विष्णु के बहुत से अवतारों में से उन्हें एक माना जाता है, लोग उन्हें कृष्णा का अवतार ही मानते थे, वे हरे कृष्णा के मन्त्र जाप के लिए प्रसिद्ध है और साथ ही वे संस्कृत भाषा की आठ सिक्सस्ताकम (भक्ति गीत) भी कविताये भी गाते थे। उन्हें अनुयायी गुडिया वैष्णव कृष्णा का अवतार ही मानते थे।
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चैतन्य महाप्रभु ने संस्कृत में कुछ लिखित सिक्सस्ताकम रिकॉर्ड किये है। चैतन्य के आध्यात्मिक, धार्मिक, महमोहक और प्रेरणादायक विचार लोगो की अंतरआत्मा को छू जाते थे। उनके द्वारे सिखाई गयी कुछ बाते निचे दी गयी है –

1. कृष्णा ही सर्वश्रेष्ट परम सत्य है।
2. कृष्णा ही सभी उर्जाओ को प्रदान करता है।
3. कृष्णा ही रस का सागर है।
4. सभी जीव भगवान के ही छोटे-छोटे भाग है।
5. जीव अपने तटस्थ स्वाभाव की वजह से ही मुश्किलों में आते है।
6. अपने तटस्थ स्वाभाव की वजह से ही जीव सभी बन्धनों से मुक्त होते है।
7. जीव इस दुनिया और एक जैसे भगवान से पूरी तरह से अलग होते है।
8. पूर्ण और शुद्ध श्रद्धा ही जीवो का सबसे बड़ा अभ्यास है।
9. कृष्णा का शुद्ध प्यार ही सर्वश्रेष्ट लक्ष्य है।
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 श्री चैतन्य के अनुसार भक्ति ही मुक्ति का साधन है। उनके अनुसार जीवो के दो प्रकार होते है, नित्य मुक्त और नित्य संसारी। नित्य मुक्त जीवो पर माया का प्रभाव नही पड़ता जबकि नित्य संसारी जीव मोह-माया से भरे होते है। चैतन्य महाप्रभु कृष्णा भक्ति के धनि थे। न्यायशास्त्र में उन्हें प्रसिद्ध पंडित भी कहा जाता था। युवावस्था में ही चैतन्य महाप्रभु ने घर को छोड़कर सन्यास ले लिया था।

उनके अनुसार –

    “हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे। हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।।”

यह महामंत्र सबसे ज्यादा मधुर और भगवान को प्रिय है।
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