क्यों मां दुर्गा की मूर्ति बनाने में उपयोग में लाई जाती है वेश्यालय की मिट्टी

भारत की संस्कृति दुनिया की सबसे अद्भुत संस्कृति मानी जाती है शायद इसलिए क्योंकि यहां की संस्कृति और आस्था के रहस्य कभी खत्म नहीं होते। और शायद आपकी पूरी उम्र लग जाए इन रहस्यों और इनसे जुड़े तथ्यों को समझने में।
इन्ही में से एक रहस्य हर साल अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान दुर्गा पूजा से भी जुड़ा – Mystery of soil custom in Durga Puja है। हर साल दुर्गा पूजा का आयोजन देशभर में बड़ी धूमधाम से होता है जिसके लिए मूर्तिकार कई महीनों से पहले मां दुर्गा की भव्य मूर्तियां बनाने में लग जाते है।
इन्ही में से एक रहस्य हर साल अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान दुर्गा पूजा से भी जुड़ा – Mystery of soil custom in Durga Puja है। हर साल दुर्गा पूजा का आयोजन देशभर में बड़ी धूमधाम से होता है जिसके लिए मूर्तिकार कई महीनों से पहले मां दुर्गा की भव्य मूर्तियां बनाने में लग जाते है।

क्यों मां दुर्गा की मूर्ति बनाने में उपयोग में लाई जाती है वेश्यालय की मिट्टी – Mystery of soil custom in Durga Puja

Durga Puja – दुर्गा पूजा को लेकर कहा जाता है कि नवरात्रि के बाद दसंवे दिन मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। यही कारण अक्टूबर के महीने में मनाई जाने वाली नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा के नौ रुपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन उनकी मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। इस दौरान कई भव्य पंडाल लगाए जाते है जहां पर गरबा, डांडिया और बंगाली डांस का आयोजन होता है।
लेकिन इन सब के बीच जो चौंकाने वाली बात अपनी ओर आकर्षित करती है वो है मां दुर्गा की मूर्ति। ऐसा इसलिए क्योंकि जिस भव्य और खूबसूरत मूर्ति की नौ दिन लोग पूजा करते है वो असल में वेश्यालय की मिट्टी से तैयार की जाती है।
वेश्यालय को लेकर हर किसी की अपनी – अपनी राय है लेकिन ये हम सब जानते है कि वेश्यालय में रहने वाली महिलाओं को लेकर लोग अच्छी सोच नहीं रखते है और उनके काम को पाप समझते हुए उन्हें समाज अलग रखते है। जिस वजह से उन्हें किसी भी अच्छे काम में शामिल नहीं किया जाता है। ऐसे में वेश्यालय की मिट्टी से मां दुर्गा की पूजा से मूर्ति बनना बहुत चौंकाने वाली बात लगती है।
मान्यताओं के अनुसार वैश्यालय के आंगन में वहां आने वाले लोगों की लालसाएं इकट्ठा हो जाती है जिस वजह इस आंगन की मिट्टी को मां दुर्गा की मूर्ति में उपयोग किया जाता है ताकि लोगों को उनके पापों से मुक्ति मिल सकें।
इस विषय को लेकर एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जिसके अनुसार एक ऋषि ने मां दुर्गा की भव्य मूर्ति का निर्माण कराया था। और अपने आश्रम में रखा था। ताकि नौ दिन मूर्ति की पूजा कर सकें। लेकिन सातवें दिन मां दुर्गा ऋषि की सपने में आई।
और मां दुर्गा ने ऋषि से कहा कि वो किसी भी ऐसी मूर्ति में वास नहीं कर सकती जो घमंड में चूर होकर बनाई हो। ऋषि के मां दुर्गा से क्षमा याचना करने पर मां दुर्गा ने ऋषि से कहा कि वो कुम्हार से कहे कि वो शहर के तवायफों के आंगन की मिट्टी लाकर मूर्ति की मिट्टी में मिले और दोबारा से मूर्ति बनाए।
मां दुर्गा ने कहा कि लोग उन्हें पापी कहकर ठुकरा देते है जबकि वो भी अपने मर्जी से ये काम नहीं करती है। और बाकियों की ही तरह वो भी मेरा ही हिस्सा है इसलिए मुझ पर उनका भी हक होना चाहिए। जिसके बाद ऋषि ने ऐसा ही किया और तवायफों के आंगन से मिट्टी लाकर नई मूर्ति बनाई।
हमसे कई लोग शायद इसे सिर्फ एक कहानी की तरह या फिर पंरपरा के तौर पर लें। लेकिन इस प्रथा के पीछे जो गहरी बात छिपी है उसे हम सभी को समझना और अपनाना चाहिए। हम किसी को भी समाज से सिर्फ इसलिए नहीं ठुकरा सकते है क्योंकि उसका कार्य हमारे समाज  में मानन्य नहीं है।

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