पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी | Pandit Dindayal Upadhyay Ki Jayanti

Pandit Dindayal Upadhyay Ki Jivani In Hindi : पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी एवं जयंती : उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य में भी उनकी गहरी अभिरुचि थी। उनके हिंदी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। केवल एक बैठक में ही उन्होंने चन्द्रगुप्त नाटक लिख डाला था। पं० दीनदयाल उपाध्याय जी (Pandit Deen Dayal Upadhyay ji) एक भारतीय विचारक, अर्थशाष्त्री, समाजशाष्त्री, इतिहासकार और पत्रकार थे उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माण में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई थी आइये जानते हैंं

पं० दीनदयाल उपाध्‍याय का जीवन परिचय  Biography of Pandit Deendayal Upadhyay in Hindi

 पं० दीनदयाल उपाध्‍याय (Pandit Deen Dayal Upadhyay) का जन्‍म 25 सितम्‍बर 1916 ई० को मथुरा (Mathura) जिले के छोटे से गाँव नगला चन्द्रभान में हुआ था इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय (Bhagwati Prasad Upadhyay) और माता का नाम रामप्यारी (Ram Pyari) था इनके पिता रेलवे में कार्यरत थेे और उनका अधिक समय बाहर ही व्‍यतीत होता था इसलिए दीनदयाल जी का बचपन अपने नाना चुन्नीलाल शुक्ल जी के यहाॅॅ व्‍य‍तीत हुुआ जो धनकिया में स्टेशन मास्टर थे जब दीनदयाल जी की आयु मात्र तीन वर्ष की थी तब उनके पिता का देहान्‍त हो गया था इनके पिता केे देहान्‍त के बाद इनकी माता भी बीमार रहने लगी और 8 अगस्‍त 1924 ई० को इनका भी देहान्‍त हो गया सात वर्ष की कोमल अ‍वस्‍था में दीनदयाल जी माता पिता के प्यार से वंचित हो गये
महाराणा प्रताप से जुड़ी कुछ रोचक व अनसुनी बातें

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जीवनी एवं निबंध : Essay on Pandit Deendayal Upadhyaya in hindi

दीनदयाल जी परीक्षा में हमेशा प्रथम स्‍थान पर आते थे उन्‍हेंने मैट्रिक और इण्टरमीडिएट-दोनों ही परीक्षाओं में गोल्ड मैडल प्राप्‍त किया था इन परीक्षाआें को पास करने के बाद वे आगे की पढाई करने के लिए एस.डी. कॉलेज, कानपुर में प्रवेश लिया वहॉ उनकी मुलाकात श्री सुन्दरसिंह भण्डारी, बलवंत महासिंघे जैसे कई लोगों से हुआ इन लोंगोंं से मुलाकात होने के बाद दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे दीनदयाल जी ने वर्ष 1939 में प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की बी.ए पास करनेे के पश्‍चात दीनदयाल जी एम.ए की पढाई करने के लिए आगरा चले गयेे लेकिन उनकी चचेरी बहन रमा देवी की मृत्‍यु हो जाने के कारण वे एम.ए की परीक्षा न दे सके

एक बार पं० दीन दयाला उपाध्‍याय जी ने सरकार द्वारा संचालित प्रतियोगी परीक्षा दी वे इस परीक्षा मेंं धोती कुर्ता और सर पर टोपी लगाकर गये जब‍कि अन्‍य परीक्षार्थी पश्चिमी सूट पहनकर आये थे तो उनका काफी मजाक उडाया गया और उन्‍हें पंडित कहकर पुकारा गया यह एक उपनाम था जिसे लाखों लोग बाद के वर्षों में उनके लिए सम्मान और प्यार से इस्तेमाल किया करते थे इस परीक्षा में दीनदयाल जी चयनित उम्मीदवारों में सबसे ऊपर रहे
इसके बाद दीनदयाल जी ने लखनऊ जाकर राष्ट्र धर्म प्रकाशन नामक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की और एक मासिक पत्रिका राष्ट्र धर्म शुरू की उन्‍होने एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘पांचजन्य’ और एक दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ शुरू किया था. उन्होंने नाटक ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ और हिन्दी में शंकराचार्य की जीवनी लिखी
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (DR. Shyama Prasad Mukherjee) भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में की और दीनदयाल अपने उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) शाखा के पहले महासचिव बने इसके बाद दीनदयाल जी 15 साल के लिए, वह संगठन के महासचिव बने

Pandit Deendayal Upadhyay History in Hindi
आरएसएस और जनसंघ – वह 1937 में सनातन धर्म कॉलेज , कानपुर में एक
छात्र था , जबकि वह अपने सहपाठी बालूजीमहाशब्दे के माध्यम से राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ (आरएसएस ) के साथ संपर्क में आया . यह वह आरएसएस , डा.
हेडगेवार के संस्थापक मिलना होगा कि वहाँ था . हेडगेवार छात्रावास में बाबा
साहेब आप्टे और दादाराव परमार्थ के साथ रहने के लिए प्रयोग किया जाता है .
डा. हेडगेवार शाखाओं में से एक पर एक बौद्धिक चर्चा के लिए उन्हें
आमंत्रित किया . सुंदर सिंह भंडारी भी कानपुर में अपने सहपाठियों से एक था .
यह अपने सार्वजनिक जीवन को बढ़ावा दिया . वह 1942 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ के पूर्णकालिक काम करने के लिए खुद को समर्पित किया. अपने अध्यापन
स्नातक अर्जित होने हालांकि प्रयाग से , वह एक नौकरी में प्रवेश नहीं करने
का फैसला किया है . उन्होंने कहा कि वह संघ शिक्षा में प्रशिक्षण लिया था
जहां नागपुर में 40 दिन की गर्मी की छुट्टी आरएसएस शिविर में भाग लिया था .
दीनदयाल , तथापि , अपने शैक्षिक क्षेत्र में बाहर खड़े हालांकि ,
प्रशिक्षण की शारीरिक कठोरता सहन नहीं कर सके . उनकी शिक्षा और आरएसएस
शिक्षा विंग में द्वितीय वर्ष के प्रशिक्षण पूरा करने के बाद , पंडित
दीनदयाल उपाध्याय आरएसएस के एक आजीवन प्रचारक बन गए। दीनदयाल उपाध्याय
बढ़ते आदर्शवाद का एक आदमी था और संगठन के लिए एक जबरदस्त क्षमता थी और एक
सामाजिक विचारक के विभिन्न पहलुओं को प्रतिबिंबित, अर्थशास्त्री,
शिक्षाशास्री, राजनीतिज्ञ, लेखक, पत्रकार, वक्ता, आयोजक आदि वह 1940 में
लखनऊ से एक मासिक राष्ट्र धर्म शुरू कर दिया. प्रकाशन राष्ट्रवाद की
विचारधारा के प्रसार के लिए चाहिए था. वह अपने नाम के इस प्रकाशन के
मुद्दों में से किसी में संपादक के रूप में मुद्रित नहीं था लेकिन उसकी
विचारोत्तेजक लेखन के कारण उसकी लंबे समय से स्थायी छाप नहीं था जो किसी भी
मुद्दे पर शायद ही वहाँ था. बाद में वह एक साप्ताहिक पांचजन्य और एक दैनिक
स्वदेश शुरू कर दिया। 
 
1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
भारतीय जनसंघ की स्थापना की, दीनदयाल अपने उत्तर प्रदेश शाखा के पहले
महासचिव बने. इसके बाद, वह अखिल भारतीय महासचिव के रूप में चुना गया था.
दीनदयाल ने दिखाया कौशल और सूक्ष्मता गहरा डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
प्रभावित और अपने प्रसिद्ध टिप्पणी हासिल। “यदि मैं दो दीनदयाल है होता, तो
मैं भारत का राजनीतिक चेहरा बदल सकता” 1953 में डॉ. मुखर्जी की मृत्यु के
बाद अनाथ संगठन पोषण और एक देशव्यापी आंदोलन के रूप में यह इमारत का पूरा
बोझ दीनदयाल के युवा कंधों पर गिर गया. 15 साल के लिए, वह संगठन के महासचिव
बने और ईंट से ईंट, इसे बनाया. वह आदर्शवाद के साथ समर्पित कार्यकर्ताओं
की एक बैंड उठाया और संगठन के पूरे वैचारिक ढांचे प्रदान की. उन्होंने यह
भी कहा कि उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन असफल रहा।मुंशी प्रेमचंद की जीवनी
 
दर्शन और सामाजिक सोच – भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक दर्शन –
उपाध्याय राजनीतिक दर्शन एकात्म मानववाद की कल्पना की. एकात्म मानववाद के
दर्शन शरीर, मन और बुद्धि और हर इंसान की आत्मा का एक साथ और एकीकृत
कार्यक्रम की वकालत. सामग्री की एक संश्लेषण और आध्यात्मिक, व्यक्तिगत और
सामूहिक है जो एकात्म मानववाद, का उनका दर्शन करने के लिए इस सुवक्ता गवाही
देता है. राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में, वह व्यावहारिक और पृथ्वी
के नीचे था. उन्होंने कहा कि भारत के लिए आधार के रूप में गांव के साथ एक
विकेन्द्रित राजनीति और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था कल्पना।
 
दीनदयाल उपाध्याय एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत व्यक्तिवाद,
लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद आदि जैसे पश्चिमी अवधारणाओं पर
भरोसा नहीं कर सकते विश्वास है कि और वह आजादी के बाद भारतीय राजनीति में
इन सतही पश्चिमी नींव पर उठाया गया है कि देखने का था और निहित नहीं था
हमारी प्राचीन संस्कृति के कालातीत परंपराओं में. उन्होंने कहा कि भारतीय
मेधा पश्चिमी सिद्धांतों और विचारधाराओं से घुटन और फलस्वरूप वृद्धि और मूल
भारतीय सोचा के विस्तार पर एक बड़ी अंधी गली वहां गया हो रही थी कि देखने
का था. वह एक ताजा हवा के लिए एक तत्काल सार्वजनिक ज़रूरत नहीं थी।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक का स्वागत किया लेकिन यह भारतीय आवश्यकताओं
के अनुरूप करने के लिए अनुकूलित किया जाना चाहता था. दीनदयाल एक रचनात्मक
दृष्टिकोण में विश्वास करते थे. उन्होंने कहा कि यह सही था जब उसके
अनुयायियों की सरकार के साथ सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया और यह गलती
जब निडर होकर विरोध करते हैं. उन्होंने कहा कि सब कुछ ऊपर राष्ट्र का हित
रखा. उन्होंने कहा कि अप्रत्याशित परिस्थितियों में मृत्यु हो गई और मुगल
सराय रेलवे यार्ड में 11 फ़रवरी 1968 को मृत पाया गया था. निम्नलिखित
गर्मजोशी कॉल वह उनके कानों में अभी भी बजता है, कालीकट सत्र में
प्रतिनिधियों के हजारों करने के लिए दिया।
हम नहीं किसी विशेष समुदाय या वर्ग का नहीं बल्कि पूरे देश की सेवा करने का
वादा कर रहे हैं. हर ग्रामवासी हमारे शरीर के हमारे रक्त और मांस का खून
है. हम उनमें से हर एक वे भारतमाता के बच्चे हैं कि गर्व की भावना को दे
सकते हैं जब तक हम आराम नहीं करेगा. हम इन शब्दों के वास्तविक अर्थ में
भारत माता सुजला, सुफला (पानी के साथ बह निकला और फलों से लदे) करेगा.
दशप्रहरण धरणीं दुर्गा (उसे 10 हथियारों के साथ मां दुर्गा) के रूप में वह
बुराई जीतना करने में सक्षम हो जाएगा, लक्ष्मी के रूप में वह सब कुछ खत्म
हो और सरस्वती के रूप में वह अज्ञान की उदासी दूर होगी समृद्धि चुकाना करने
में सक्षम हो और चारों ओर ज्ञान की चमक फैल जाएगा उसे . परम जीत में
विश्वास के साथ, हमें इस कार्य को करने के लिए खुद को समर्पित करते हैं।
पंडित उपाध्याय पांचजन्य (साप्ताहिक) और लखनऊ से स्वदेश (दैनिक) संपादित.
हिंदी में उन्होंने एक नाटक चंद्रगुप्त मौर्य लिखा है, और बाद में
शंकराचार्य की जीवनी लिखी गई है. उन्होंने कहा कि डा. केबी हेडगेवार,
आरएसएस के संस्थापक के एक मराठी जीवनी का अनुवाद किया।

11 फ़रवरी 1968 को 52 वर्ष की अवस्‍था में दीनदयाल जी हत्‍या कर दी गई इनका पार्थिक शरीर मुगलसराय स्‍टेशन के यार्ड में मिला था

About Pandit Deendayal Upadhyaya : पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी

उपाध्यायजी की कृतियाँ

जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता दीनदयालजी का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टी प्रदान करना था . उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी.दीनदयालजी को जनसंघ के आर्थिक नीति के रचनाकार बताया जाता है . आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य समान्य मानव का सुख है या उनका विचार था . विचार –स्वातंत्रय के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधारा को पनपने का अवसर मिला है . इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद , अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं . किन्तु चराचर जगत को सन्तुलित , स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन – विज्ञान, जीवन –कला व जीवन–दर्शन है.

संस्कृतिनिष्ठा दीनदयाल जी के द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवनदर्शन का पहला सुत्र है उनके शब्दों में- “ भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं . उनकी जीवन प्रणाली ,कला , साहित्य , दर्शन सब भारतीय संस्कृति है . इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है . इस संस्कृतिमें निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा .”
Kalpana Saroj 2 रुपये से 500 करोड़ तक

“वसुधैव कुटुम्बकम” हमारी सभ्यता से प्रचलित है . इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मो को समान अधिकार प्राप्त हैं . संस्कृति से किसी व्यक्ति ,वर्ग , राष्ट्र आदि की वे बातें जो उनके मन,रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता का सूचक होता है पर विचार होता है . दो शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है . भारतीय सरकारी राज्य पत्र (गज़ट) इतिहास व संस्कृति संस्करण मे यह स्पष्ट वर्णन है की हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म एक ही शब्द हैं तथा यह भारत के संस्कृति और सभ्यता का सूचक है .

उपाध्यायजी पत्रकार तो थे ही चिन्तक और लेखक भी थे। उनकी असामयिक मृत्यु से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जिस धारा में वह भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा हिन्दुत्व की थी जिसका संकेत उन्होंने अपनी कुछ कृतियों में ही दे दिया था। तभी तो कालीकट अधिवेशन के बाद विश्व भर के मीडिया का ध्यान उनकी ओर गया। उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम नीचे दिये गये हैं-

  •     दो योजनाएँ ,
  •     राजनीतिक डायरी,
  •     भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन ,
  •     सम्राट चन्द्रगुप्त ,
  •     जगद्गुरु शंकराचार्य, और
  •     एकात्म मानववाद (अंग्रेजी: Integral Humanism)
  •     राष्ट्र जीवन की दिशा 

चक्रवर्ती सम्राट अशोक : जीवन परिचय

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