परियों की कहानियां : मछली बोली | Pariyon Ki Kahaniya : Machli Boli In Hindi

परियो का नाम सुनते ही हम एक अलग ही दुनिया में चले जाते है अभी तक किसी को भी यह सही रूप में नही पता की क्या वाकई में परिया होती है या नही।  चाहे कुछ भी हो पर उनसे  जुड़े किसे कहानियां हमे एक रोमांच के सफर की और ले जाते है अगर आप भी कुछ समय अपनी सारी समस्याएं भूल कर यह कहानी बढेंगे तो आपको भी बहुत मजा आएगा। आओ कहानी की और चलते है।
Pari Stories in Hindi 

परी की कहानी 
Pari Ki Kahani In Hindi

पंचतंत्र की कहानिया
पहले समय में आर्यावर्त के एक प्रदेश में राजा ब्रह्मदत का शासक था। राजा ब्रह्मदत का एक पुत्र था। उसका नाम था प्रियम। प्रियम एक होनहार युवक था। वह राज काज में अपने पिता को भरपूर सयोग देता था। बड़ी से बड़ी समस्या सुलझाने में वह अपने पिता का सायक बन जाता था। उसे शिकार करने का बहुत शोक था।

एक बार राजकुमार ने अपने पिता से वन भ्रमण करने की आज्ञा मांगी। पिता ने उसे सहर्ष आज्ञा दे दी। जाते समय उसने अपने पुत्र से कहा —बेटा ! तुम जहा भी पड़ाव डालो वहा का हाल -चाल किसी दूत के साथ मेरे पास जरूर भेजते रहना ,ताकि में तुमारी और से निश्चित रह सकु।

राजकुमार ने हामी भर दी। और अपने सेवको को साथ लेकर शिकार करने चल पड़ा। उसके साथ पचास आदमियो का काफिला था। उन सब के पास भोजन की सामग्री के अलावा तीरकमान और  दूसरे प्रकार हथियार थे।

अक्सर राजकुमार किसी जंगल में अपना पड़ाव डाल देता था। वह शिकार खेलते – खेलते धनुष विधा में निपुण हो गया था। अनेक जंगलो से होता हुआ एक दिन राजकुमार सूंदर वन में पहुचा। वह घोड़े पर सवार था और उसके साथ – साथ काफिला चल  रहा था। संध्या का समय था। राजकुमार आखेट के लिए आगे बढ़ रहा था न जाने वह कैसे अपने काफिले से बिछुड़ गया।

काफिला आगे बढ़ता गया और वह पीछे रह गया। साथ ही वह किसी दूसरी दिशा में भटक गया।

राजकुमार ने इधर – उधर घूम कर देखा , काफिले के साथियो का कोई आता पता नही था। उसे प्यास लग आई ,पर पानी भी तो उसके साथियो के पास ही रह गया था। इतने बड़े जंगल में अब वह अकेला था। वह अपने माता पिता और गुरु का स्मरण करने लगा। कुछ रुकता फिर आगे बढ़ता। साय – साय की आवाज उसके कानो को भेद रही थी।  अंधकार भी घेरने लगा था।

धीरे – धीरे आकाश में तारे टीम टिमाने लगे। घोडा भी आगे बढ़ने से हिचकिचाने लगा। इतने बड़े जंगल में वही तो उसका सहारा था। कुछ दूर चलने के बाद अब वह खुले स्थान में आ गया।

रात्रि का आधा पहर समाप्त हो गया था। कुछ और दूर चला तो उसको एक नदी दिखाई दी। घोडा बहुत थक गया था उसके पैर भी लड़खड़ा रहे थे।
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अनायास ही उसके कानो में किसी की बात चित का स्वर सुनाई पड़ा। राजकुमार को आश्चर्य हुआ की इस सुनसान जंगल में यह आवाज कहा से आ रही है। वह नदी किनारे पहुचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना ही नही रहा। अति सुंदर स्वेत वस्त्र पहने एक लड़की नदी किनारे बैठी मछलियों से बात कर रही थी। मछलिया भी पानी में उछल –  खेल रही थी प्रियम आश्चर्य में पड़ गया।
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कैसी आत्मीयता थी उन छोटी – बड़ी मछलियों के बिच। दूर खड़ा राजकुमार यह सब देखता रहा। फिर वह साहस करके आगे बढ़ा। उसका पद चाप सुनकर उस लड़की का ध्यान उसकी और गया। राजकुमार ने उसके पास पहुच कर उस से कहा —“पहले अपने बारे में बताओ फिर में मेरा परिचय दुग इस समय में मुसीबत का मारा हूँ।

लड़की बोली —- आप खड़े क्यों है पहले बैठ जाओ।

राजकुमार उसके समीप ही बैठ गया।  उसके बाद दोनों ने अपने – अपने बारे में बताया। परिचय जान कर दोनो मे घनिष्ठ हो गयी। लड़की बोली कभी में भी इन मछलियों की तरह एक ही मछली थी। एक दिन प्परियों की रानी अपनी कुछ सहेलियो के साथ पूर्णिमा की रात इस नदी में स्नान करने आयी। वे सारी रात गाना गाती रही नृत्य करती रही। सभी मछलियों को उसका नाचना गाना बहुत अच्छा लगा। मुझे भी बहुत आनंद आया। में ख़ुशी के मारे नाचने लगी। परियो की रानी मेरा नाच देखकर बहुत खुश हुई। उसने मेरी खूब प्रशसा की। उसने मुझसे परी लोक चलने को कहा।
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राजकुमार प्रियम बड़े ध्यान से उस लड़की की बाते सुन रहे थे।

थोड़ी समय बाद वह लड़की पुनः बोली —परी रानी ने दो मिनट मोन होकर अपने देवता से मुझे परी बनाने की प्रार्थना की। उसके देवता ने परी रानी की प्रार्थना स्वीकार कर ली। प्रार्थना के बाद में परी बन गई। उसी दिन से में उन सब के साथ रहती हूँ। यहाँ कभी – कभी अपनी पुरानी सहलियों से मिलने चली आती हूँ।

उसके बाद राजकुमार ने परी को अपनी समस्या बताई।
परी ने अपने जादू से परी लोक से राजकुमार के लिए फल और मिठाईया मंगवाई। उसने राजकुमार से कहा आज से हम दोनों मित्र बन गए है। आप यह फल और मिठाइयां खाकर अपनी भूख मिटाए।

उसके बाद राजकुमार ने पेट भर कर फल और मिठाई खाई और अपनी भूख मिटाई। उसके बाद परी और राज कुमार बहुत देर तक बाते करते रहे।

भोर होने को थी इस लिए परी अपने लोक में वापस जाने की तैयारी करने लगी। उसे उड़ने के लिए तैयार होता देख राज कुमार ने कहा मुझे भी अपने साथ ले चलो
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परी ने कहा ऐसा करना मेरे लिए सभव नही। इसके लिए में आप से माफ़ी मांगती हूँ। में तुम्हारा परिचय नदी की सभी मछलियों से करा देती हूँ। अगर तुम कभी मुझसे मिलना चाहो तो इसी स्थान पर रात्रि के बारह बजे आजाना। में तुमसे अवश्य मिलूँगी। अब तुम अपने घर जाओ। मार्ग में तुम्हारा काफिला तुम्हे मिल जाएगा।

इसके बाद वह परी तो अपने परी लोग उड़ चली और राजकुमार अपने घोड़े पर बैठ कर अपने साथियो के काफिले की खोज के लिए चल पड़ा। कुछ आगे चलने पर उसे उसका काफिला दिखाई पड़ा। वह अपने काफिले में जा मिला। फिर वे सब अपने नगर को लोट आये। राजकुमार को खेद था की वह परी लोक नही जा सका था ,किंतु उसने उस परी से मित्रता जरूर कर ली थी और सच्ची मित्रता ही जीवन में काम आती है

शिक्षा :- यह संसार स्वार्थी लोगो से भरा पड़ा है। यहाँ सचा मित्र बहुत मुश्किल से मिलता है। इसलिए जो व्यक्ति विपति के समय में  का साथ न छोड़े वही आप का सच्चा मित्र है।

मधुशाला पर यह कहानी पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद !! अपने मित्रो को भी शेयर करे !
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