श्रीकालहस्ती मन्दिर के अद्धभुत रहस्य – Srikalahasti Temple Story in Hindi

Srikalahasti Temple History in Hindi – आंधप्रदेश के चितूर जिले में तिरुपति शहर से लगभग ४० किलो मीटर की दूरी पर एक प्रसिद्ध मंदिर है जिसका नाम श्रीकालाहस्ती मंदिर जैसे की नाम से ही पता चलता है की मंदिर के नाम में ही एक रहस्य है इस मंदिर का निर्माण ५ वि शताब्दी में करवाया गया था 10वी सदी में चोला वंश के राजाओ ने और 12वी सदी में विजयानगर के राजा कृष्णदेवराय ने बाहरी हिस्से का निर्माण करवाया था| जिनका रूप वास्तुकला के रूप में मंदिर के बाहरी स्तम्भों में दिखायी देती है राजा कृष्णदेवराय  ने सौ पिलरों का मंडप बनवाया था

श्रीकालहस्ती मन्दिर के अद्धभुत रहस्य – Srikalahasti Temple Story in Hindi

इस मंदिर का मुख दक्षिण कि और है जो सफ़ेद रंग से ढखा है |  यह पेन्नार नदी के स्वर्ण मुखी तट पर स्थित है यह नदी के तट से लेकर पर्वत की तलहटी तक फैला हुआ है मंदिर के पीछे तिरुमलय की पहाड़ियाँ दी खाई देती है जो की बहुत ही सुन्दर है यहां साक्षात लिंग के रूप में भगवान शिव विराजमान है ये शिवलिंग पंचमहाभूतो में से एक वायु तत्व से निर्मित है जो की अदभुत है और सभी लिंगो से भिन्न है इस कारण इस शिवलिंग को स्पर्श नहीं किया जाता पास ही एक स्वर्ण पट बना हुआ है उसकी ही पूजा होती है |

इसका नाम श्री  (मकड़ी) काल  (सांप) हस्ती   (हाथी) इन तीन शब्दों से मिलकर बना है कहा जाता है की इन तीनो ने यहां शिव भगवान की आराधना की थी श्राप से मुक्ति पाने के लिए मकड़ी ने शिवलिंग पर जाल बनाकर पूजा की तथा साँप ने शिवलिंग से लिपट कर और हाथी ने जल चढ़ाकर पूजा अर्चना की थी जिसके कारण शिव भगवान ने प्रसन्न हो कऱ दर्शन दिए जब से इस मंदिर का नाम श्रीकालाहस्ती मंदिर पड गया |

यहां एक कन्नपा नामक आदिवासी ने शिवलिंग से बहने वाले खून को बंद करने के लिए तपस्याकी थी भगवान शिव ने उसकी भक्ति कि परीक्षा लेने के लिए उसकी आंखे दान में मांगी भक्त कणप्पा ने आंखे दान में दे दी जिससे प्रसन हो कर भगवान शिव ने कणप्पा को मोक्ष प्रदान किया ऐसा भी माना जाता है की अर्जुन ने भी यहां शिवलिग की पूजा की थी जिसके कारण श्रीकालाहस्ती के अर्जुन को दर्शन हुएयही पर अर्जुन को पर्वत के शीर्ष पर भारव्दाज मुनि से भेंट हुई थी

श्रीकालहस्ती मन्दिर के अद्धभुत रहस्य – Srikalahasti Temple Story in Hindi

इस मंदिर को दक्षिण कैलाश या दक्षिण काशी  भी कहा जाता हैमुख्य बात यह है की शिवलिंग पर मकड़ी ,साँप के फण और हाथी के दांतो के चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई देते है यहां पर इन तीनो की मुर्तिया भी है यहां तीन विशाल गोपुरम है मंदिर में सौ स्तम्भों का मंडप है मंदिर के अन्दर सस्त्र शिविलिंग है जो की कभी कभार दिखाए देते है यहां मंदिर में देवी ज्ञानप्रसून अम्बा भी विराजमान है यह राहुकाल के समय पूजा होती है इसलिए इस मंदिर को राहु केतु का मंदिर भी कहते है और भी बहुत सारे भगवानो के मंदिर है जैसे माता पार्वती का गणेश का, यमराज,धर्मराज, कार्तिक, नटराज, ये सभी मंदिर की परिक्रमा में आते है  यहां इक्यावन पीठो में से एक माता सती का शक्ति पीठ भी है माना जाता है की यहां माता सती का स्कन्ध गिरा था |

यहां मंदिर के पास और भी कई मंदिर है जो देखने में अदभुत है जैसे विश्रनाथ का मंदिर ,सूर्यपरायण मंदिर, मणिकांणिका मंदिर कणप्पा मंदिर, कृष्णदेवार्य मंडप, वैय्यालिंगाकोण यहां पर सहस्त्र लिंगो की घाटी है और पास ही पहाड़ी पर दक्षिण में काली का मंदिर है|  इस मंदिर तीर्थ स्थल पर आने के लिए विजयवाड़ा से सभी तरह के साधन उपलब्ध है तिरुपति आने वाले सभी ट्रैन कालहस्ती रुकती है |  यह मंदिर  अदभुत मंदिर माना जाता है   इस  मंदिरको सफ़ेद पत्थर से बनाया गया है

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