17.अलेक्जेंडर सिकंदर का जीवन परिचय व इतिहास | Alexander The Great Sikandar Biography and History in Hindi



अलेक्जेंडर सिकंदर का जीवन परिचय व इतिहास | Alexander The Great Sikandar Biography and History in Hindi -  दोस्तों आज हम सिकंदर के इतिहास के बारे में जानेगे और समझेंगे। पीछे हमने पढ़ा की नंद वंश के समय सिकंदर भारत विजय के लिए आता है। इधर मगध में नंद वंश का अंतिम शासक धनानंद राज गद्दी पर बैठा होता है। अगर आपने अलेक्जेंडर सिकंदर से पहले का इतिहास नही जाना है तो यहा क्लिक करे - नंद वंश का इतिहास

आगे हम मौर्य वंश को पढ़ेंगे तो मौर्य वंश को जानने से पहले हमे सिकंदर के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जान लेने अतिआवश्यक है। 
सिकंदर का जीवन परिचय व इतिहास

नाम - अलेक्जेंडर तृतीय

अन्य नाम - सिकंदर 

पिता का नाम - फिलिप द्वितीय

माता का नाम - ओलिम्पिया

पत्नी का नाम रोक्जाना

जन्म - 20 जुलाई 356 ईसा पूर्व

जन्म स्थान - पेला ( ग्रीस )

जीते हुए देश - एथेंस,एशिया माइनर,पेलेस्टाइन और पूरा पर्सिया और सिन्धु के आगे तक का भारत 

मृत्यु - 13 जून 323 ईसा पूर्व (32 वर्ष की उम्र)

मृत्यु की जगह - बेबीलोन 

उपाधि - विश्व विजेता 

सिकंदर का बचपन 
सिकंदर का पालन पोषण उनकी माँ ने ही किया था। सिकंदर की एक बहिन भी थी। पिता ज्यादा समय सैन्य अभियानों में व्यस्त रहते थे। बचपन से ही अलेक्जेंडर को घुड़ सवारी का बहुत शौंक था। सिकंदर ने अपनी शुरुआती शिक्षा अपने रिश्तेदार दी स्टर्न लियोनीडास ऑफ़ एपिरुस से ली थी। सिकंदर शरू से ही उग्र और विद्रोही स्वभाव का बालक था। 

महान दार्शनिक अरस्तु भी थे सिकंदर के गुरु 
विश्व विजेता सिकंदर के कई गुरु थे। जब वह 13 वर्ष का हुआ था तब फिलीप ने सिकन्दर के लिए एक निजी शिक्षक एरिस टोटल की नियुक्ति की थी। एरिस्टोटल को भारत में अरस्तु कहा जाता हैं।  अगले 3 वर्षों तक अरस्तु ने सिकंदर को साहित्य की शिक्षा दी थी और साथ ही साथ वाक्पटुता भी सिखाई थी।  इसके अलावा अरस्तु ने सिकन्दर का रुझान विज्ञान, दर्शन-शास्त्र और मेडिकल के क्षेत्र में भी जगाया था। अरस्तु के द्वारा सिखाई गई सभी विधाएँ आगे चलकर सिकंदर के बहुत काम आई थी। 

पिता के विजय अभियानों की कहानियों को सुनकर बड़ा हुआ सिकंदर 
अपने पिता की जीत पर जीत एवं विजय की कहानियों को सुनकर ही बड़ा हुआ था सिकंदर। महज 11 वर्ष की उम्र में अलेक्जेंडर ने घुड़सवारी सीख ली थी। 336 ई. में अलेक्जेंडर की बहन ने मोलोस्सियन के राजा से शादी की इसी दौरान होने वाले महोत्सव में पौसानियास ने राजा फिलिप द्वितीय की हत्या कर दी थी। अपने पिता की मृत्यु के समय अलेक्जेंडर 19 वर्ष का था और उसमें सत्ता हासिल करने का जोश और जूनून चरम पर था। यहाँ से सिकंदर ने विश्व विजेता बनने का सपना देख लिया था। अपनी मृत्यु तक वह उस तमाम भूमि को जीत चूका था जिसकी जानकारी प्राचीन ग्रीस लोगों को थी। इसी कारण इसे विश्व विजेता भी कहा जाता है। 

विश्व विजय यात्रा शुरू 
जब सिकंदर सम्राट बना तो उसने मकदूनिया के आस-पास के राज्यों को जीतना शुरु कर दिया था। उसने सबसे पहले यूनान के रास्ते में अपनी जीत दर्ज करवाई। और फिर वह एशिया माइनर की तरफ बढ़ा। अनेक शानदार युद्ध अभियानों के बीच उसमे एशिया माइनर को जीतकर सीरिया को पराजित किया और फिर इरान, मिस्र, मसोपोटेमिया, फिनीशिया, और बॅक्ट्रिया प्रदेश पर विजय हासिल की थी।

यह सभी क्षेत्र उस समय विशाल फ़ारसी साम्राज्य के अंग थे, जो कि मिस्त्र, इरान से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक फैला था। अगर सिकंदर के साम्राज्य की तुलना फारसी साम्राज्य से की जाए तो फारसी साम्राज्य, सिकंदर के साम्राज्य से करीब 40 गुना ज्यादा बड़ा था, जिसका शासक डेरियस तृतीय था।

लेकिन सिकंदर ने उसे भी अरबेला के युद्ध अपनी सैन्य शक्ति से हराकर उसका साम्राज्य हासिल कर लिया था। और स्वयं वहां का राजा बन गया। जनता का ह्रदय जीतने के लिए उसने फारसी राजकुमारी रुखसाना से विवाह कर लिया था। फारसी में उसे एस्कंदर-ए-मक्दुनी (मॅसेडोनिया का अलेक्ज़ेंडर) औऱ हिंदी में सिकंदर महान कहा जाता है।

सिकंदर की भारत यात्रा 
326 ईसा पूर्व में यूनानी शासक सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया था। पंजाब में सिंधु नदी को पार करते हुए सिकंदर तक्षशिला पहुंचा, उस समय चाणक्या तक्षशिला मे अध्यापक थे। वहां के राजा आम्भी ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली। चाणक्या ने भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए सभी राजाओ से आग्रह किया किंतु सिकंदर से लड़ने कोई नही आया। और पश्चिमोत्तर प्रदेश के अनेक राजाओं ने तक्षशिला की देखा देखी सिकंदर के सामने आत्म समर्पण कर दिया।

326 ईसा पूर्व में यूनानी शासक सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया था। पंजाब में सिंधु नदी को पार करते हुए सिकंदर तक्षशिला पहुंचा, उस समय चाणक्या तक्षशिला मे अध्यापक थे। वहां के राजा आम्भी ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली। चाणक्या ने भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए सभी राजाओ से आग्रह किया किंतु सिकंदर से लड़ने कोई नही आया। और पश्चिमोत्तर प्रदेश के अनेक राजाओं ने तक्षशिला की देखा देखी सिकंदर के सामने आत्म समर्पण कर दिया।

जब भारत के पोरस राजा से हुआ था सिकंदर का आमना - सामना 
आपको बता दें कि राजा पोरस को काफी शक्तिशाली शासक माना जाता था। वहीं पंजाब में झेलम से लेकर चेनाब नदी तक राजा पोरस का राज्य था।युद्ध में पोरस पराजित हुआ परन्तु सिकंदर को पोरस की बहादुरी ने काफी प्रभावित किया था, क्योंकि जिस तरह राजा पोरस ने लड़ाई लड़ी थी उसे देख सिकंदर दंग थे। और इसके बाद सिकंदर ने राजा पोरस से दोस्ती कर ली और उसे उसका राज्य और कुछ नए इलाके भी दिए। दरअसल सिकंदर को कूटनीतिज्ञ समझ थी इसलिए आगे किसी तरह की मदद के लिए उसने पोरस से व्यवहारिक तौर पर दोस्ताना संबंध जारी रखे थे।

उसके बाद सिकंदर की सेना ने छोटे हिंदू गणराज्यों के साथ लड़ाई की। इसमें कठ गणराज्य के साथ हुई लड़ाई काफी बड़ी थी। आपको बता दें कि कठ जाति के लोग अपने साहस के लिए जानी जाती थी।यह भी माना जाता है कि इन सभी गणराज्यों को एक साथ लाने में आचार्य चाणक्य का भी बहुत बड़ा योगदान था। इस सभी गणराज्यों ने सिकंदर को काफी नुकसान भी पहुंचाया था जिससे सिकंदर की सेना बेहद डर गई थी।सिकंदर व्यास नदी तक पहुँचा, परन्तु वहाँ से उसे वापस लौटना पड़ा। क्यूंकि कठों से युद्ध लड़ने के बाद उसकी सेना ने आगे बढ़ने से मना कर दिया था। दरअसल व्यास नदी के पार नंदवंशी के राजा के पास 20 हजार घुड़सवार सैनिक, 2 लाख पैदल सैनिक, 2 हजार 4 घोड़े वाले रथ और करीब 6 हजार हाथी थे।सिकंदर पूरे भारत पर ही विजय पाना चाहता था लेकिन उसे अपनी सैनिकों की मर्जी की वजह से व्यास नदी से ही वापस लौटना पड़ा था।

पूरी दुनिया पर शासन करने का सपना संजोने वाले सम्राट सिकंदर जब 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन (Babylon) पहुंचे तो वहां पर उसे भीषण बुखार (Typhoid) ने जकड़ लिया। अत: 33 वर्ष की उम्र में 10 जून 323 ईसा पूर्व में सिकन्दर की मृत्यु हो गई।

बहुत ही कम अवधि में जीत लिया विश्व 
केवल 10 वर्ष की अवधि में इस अपूर्व योद्धा ने अपने छोटे से राज्य का विस्तार कर एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया था। हालाँकि उसकी मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य बिखर गया, और इसमें शामिल देश आपस में शक्ति के लिए लड़ने लगे। ग्रीक और पूर्व के मध्य हुए सांस्कृतिक समन्वय का एलेक्जेंडर के साम्राज्य पर विपरीत प्रभाव पड़ा।

मरने के बाद कुछ भी नहीं गया साथ 
सिकंदर के मृत्यु के बाद जब उसकी अरथी को ले जाया जा रहा था, तब अरथी के बाहर सिकंदर के दोनों हाथ बाहर लटके हुए थे। क्यूंकी उसने मृत्यु से पहले कहा था की जब मेरी मृत्यु हो जाए तो मेरे हाथ अरथी के अंदर मत रखना, सिकंदर चाहता था उसके हाथ अरथी के बाहर रहें। वह पूरी दुनिया को यह दिखाना चाहता था की जिसने दुनिया को जिता, जिसने अपने हाथ में सब कुछ भर लिया, मरने के बाद वह हाथ भी खाली हैं। जैसे इंसान खाली हाथ दुनिया मे आता हैं वैसे ही खाली हाथ उसे जाना पड़ता है, चाहे वह कितना भी महान क्यों न बन जाये।