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14.हर्यक वंश का इतिहास - मगध सम्राज्य की स्थापना | बिम्बिसार | अजातशत्रु - Haryak Vansh Ka Itihas - Magadh Samrajya

दोस्तों महाजनपद काल में मगध सम्राज्य अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है। प्राचीन भारत को समझने के लिए सबसे पहले हम हर्यक वंश से शरुआत करेंगे। तो आइये फ्रेंड्स जानते है हर्यक वंश के बारे में।

हर्यक वंश की स्थापना - (544 ई. पू. से 412 ई. पू. तक) बिम्बिसार ने की थी। अगर आपने हर्यक वंश से पहले का इतिहास नही जाना है तो यहा क्लिक करे - महाजनपद काल का इतिहास

यही से ही बिहार एक बड़ी शक्ति के रूप में प्रकट हुआ था। वर्तमान में जो बिहार की स्थिति है प्राचीन समय में ऐसी नहीं थी। पहले यह शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। भारत के बहुत बड़े - बड़े राजाओ ने यहाँ राज किया है और फिर मुगलों का आक्रमण भी इस धरती ने सहा है।
Haryak Vansh Ka Itihas - Haryanka Dynasty 

बिम्बिसार मगध का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

मगध की राजधानी - गिरिव्रज (राजगीर)

पहला शासक - बिम्बिसार
अंतिम शासक - नागदशक

हर्यक वंशी शासको के नाम  -
  1. बिम्बिसार (544 ई. पू. से 493 ई. पू.)
  2. अजातशत्रु (493 ई.पू. से 461 ई.पू.)
  3. उदायिन (461 ई.पू. से 445 ई.पू.)
  4. अनिरुद्ध
  5. मंडक
  6. नागदशक

यह नाग वंश की एक उपशाखा के लोग थे। बिम्बिसार का दूसरा नाम 'श्रेणिक' था। बिम्बिसार ने अपने राज्य विस्तार के लिए कौशल और वैशाली के साथ वैवाहिक संबंध भी बनाए थे।

बिम्बिसार की पहली पत्नी 'महाकोशला' प्रसेनजित की बहन थी, जिससे उसे काशी नगर का राजस्व प्राप्त हुआ। और बिम्बिसार की दूसरी पत्नी 'चेल्लना' वैशाली के लिच्छवी प्रमुख चेतक की बहन थी। इसके पश्चात् बिम्बिसार ने मद्र देश की राजकुमारी 'क्षेमा' के साथ अपना विवाह कर मद्रों का सहयोग और समर्थन प्राप्त किया।

 'महाबग्ग' में सम्राट बिम्बिसार की 500 पत्नियों का उल्लेख है। कुशल प्रशासन की आवश्यकता पर सर्वप्रथम बिम्बिसार ने ही ज़ोर दिया था।

बौद्ध साहित्य में उसके कुछ पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं -

सब्बन्थक महामात्त (सर्वमहापात्र) - यह सामान्य प्रशासन का प्रमुख पदाधिकारी होता था।
बोहारिक महामात्त (व्यावहारिक महामात्र) - यह प्रधान न्यायिक अधिकारी अथवा न्यायाधीश होता था।सेनानायक महामात्त - यह सेना का प्रधान अधिकारी होता था।

बिम्बिसार एक कुशल राजा था जो अपनी प्रजा की हर समस्या में रूचि लेता था और उनकी समस्याओं को हल करता था। उसकी सभा में 80 हजार गावों के प्रतिनिधि भाग लेते थे। वह जैन, बौद्ध, ब्राह्मण सभी को मानने वाला था। जैन धर्म के लोग उसे अपने मत का पोषक मानते है।

एक बहुत ही प्राचीन ग्रंथ 'दीर्धनिकाय' में लिखा मिलता है की बिम्बिसार ने चम्पा के प्रसिद्ध ब्राह्मण सोनदण्ड को वहाँ से प्राप्त हुई पूरी आमदनी दान में दे दी थी। हमें पुराणों से यह जानकारी मिलती है की बिम्बिसार ने करीब 32 वर्ष तक शासन किया था। और साथ ही साथ बिम्बिसार महात्मा बुद्ध के अच्छे मित्र भी थे और उनकी बातो को मानने वाले अच्छे राजा भी थे।

बिम्बिसार का अवन्ति से अच्छा सम्बन्ध था, क्योंकि जब अवन्ति के राजा प्रद्योत बीमार थे, तो बिम्बिसार ने अपने वेद जीवक को उसके पास भेजा था। बिम्बिसार ने अंग और चम्पा को जीता और वहाँ पर अपने पुत्र अजातशत्रु को उपराजा नियुक्त किया था। अंतिम समय में बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु ने ही अपने पिता की हत्या कर दी थी।

अब थोड़ा हम अजातशत्रु के बारे में जान लेते है। हर्यक वंश में यह दोनों शासक ही अतिमहत्वपूर्ण है।


अजातशत्रु  (493 ई.पू. से 461 ई.पू.)

बचपन का नाम - कुणिक'

पिता का नाम - बिम्बिसार

अजातशत्रु ने मगध की राजगद्दी अपने पिता की हत्या करके प्राप्त की थी। यह एक घृणित कृत्य था, फिर भी एक वीर और प्रतापी राजा के रूप में उसने ख्याति प्राप्त की थी। अपने पिता की तरह ही उसने भी साम्राज्य विस्तार की नीति को अपनाया और साम्राज्य की सीमाओं को चरमोत्कर्ष तक पहुँचा दिया।

अजातशत्रु के समय की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना बुद्ध का महापरिनिर्वाण था।  (464 ई.पू.)  उस घटना के अवसर पर बुद्ध की अस्थि प्राप्त करने के लिए अजातशत्रु ने भी प्रयत्न किया था और अपना अंश प्राप्त कर उसने राजगृह की पहाड़ी पर स्तूप बनवाया था।

प्रथम बौद्ध संगीति अजातशत्रु के द्वारा ही हुई थी। जिसमें सुत्तपिटक और विनयपिटक का संपादन हुआ था।

कोसल के राजा प्रसेनजित को हराकर अजातशत्रु ने राजकुमारी 'वजिरा' से विवाह किया था, जिससे काशी जनपद स्वतः ही उसे प्राप्त हो गया था। इस प्रकार उसकी इस नीति से मगध शक्तिशाली राष्ट्र बन गया। परंतु पिता की हत्या करने और पितृघाती कहलाने के कारण इतिहास में वह सदा अभिशापित रहा। पिता की हत्या करने के कारण इसका मन अशांत हो गया। यह अजीवक धर्म प्रचारक गोशाल और जैन धर्म प्रचारक महावीर स्वामी के निकट भी गया। किंतु इसे शांति नहीं मिली। फिर यह बुद्ध की शरण में गया। जहाँ उसे आत्मिक शांति मिली। इसके बाद यह बुद्ध का परम अनुयायी बन गया था।

अंत में अजातशत्रु के पुत्र उदायिन ने अजातशत्रु की हत्या कर राजसिंहासन प्राप्त कर लिया था। हर्यक वंश का अंतिम शासक नागदशक था।

नागदशक के अमात्य शिशुपाल ने उसकी निर्बलता का लाभ उठा कर गद्दी पर अधिकार कर लिया और एक नए वंश शिशुनाग वंश की स्थापना कर दी।