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लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस : खूब लड़ी मर्दानी थी वो झाँसी वाली रानी थी

लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस : खूब लड़ी मर्दानी थी वो झाँसी वाली रानी थी - Jhansi Ki Rani - Lakshmibai The Rani of Jhansi - बिठूर की मनु की कहानी - रानियों में सर्वश्रेस्ट - 18 जून 1885 बलिदान दिवस 


जन्म - 19 नवंबर 1828 (वाराणसी)
मृत्यु - 18 जून 1858 (ग्वालियर )
पूरा नाम - मणिकर्णिका तांबे 
माता का नाम - भागीरथीबाई
पिता का नाम - मोरोपंत तांबे

लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस : खूब लड़ी मर्दानी थी वो झाँसी वाली रानी थी 

अंग्रेजो को धूल चटाई 
आज भी अगर हम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुनते है तो हमारी रगों में खून खोल उठता है। वाकई में ऐसी महिला का तो पूरा भारत हमेशा ही ऋणी रहेगा। इन्होंने अंग्रेजो से सिर्फ झांसी ही नहीं बल्कि पुरे देश को बचाया है। 

कम उम्र में ही विवाह 
1857 की पहली क्रांति में इनकी भी मुख्य भूमिका है। 14 वर्ष की उम्र में इनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ था। 

आज ही के दिन हुई वीरगति  अग्रेजो के साथ लड़ती हुई 1858 में आज ही के दिन 18 जून को रानी लक्ष्मीबाई वीरगती को प्राप्त हो गई थी। इस समय इनकी उम्र महज 30 वर्ष ही थी। 

सभी विद्याओं में कुशल थी रानी लक्ष्मीबाई  मां भागीरथी बाई के जल्द गुजर जाने के बाद वह महज चार वर्ष की आयु में पिता मोरोपंत तांबे के साथ बिठूर के पेशवा महल में आ गई। यहीं नाना साहब के साथ उनकी शिक्षा दीक्षा हुई। शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्रों में निपुणता हासिल की। तलबारबाजी, धनुष विद्या, घुड़सवारी और युद्धकौशल में अमित छाप छोड़ी। घुड़सवारी से उन्हें बेहद प्यार था। उनका सारंग नाम का एक घोड़ा भी था।

पति की मृत्यु के बाद भी झाँसी को बचाया 
जब झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हुई। इसके बाद से ही अंग्रेज झांसी का राज्य हड़पना चाहते थे। ऐसे में अपना राज्य एवं अपनी भूमि बचाने के लिए एक रानी को राजाओं की तरह लड़ना पड़ा था। 

भारत के इतिहास में दर्ज एक वीर महिला 
1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की अंग्रेजों को कई बार धूल चटाई। 18 जून 1858 को अंग्रेजों से युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हो गई। विश्वासपात्र सिपाही उन्हें ग्वालियर में स्थित बाबा गंगादास की कुटिया में ले गए। यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। इतिहासकार देवेंद्र सिंह के मुताबिक मनु ने बिठूर में जो युद्ध कलाएं सीखी, उन्हें झांसी में धार दी। वहीं उन्हें इन कलाओं को आजमाने का मौका मिला था। वीएसएसडी कालेज में इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम ¨सह कहते हैं, अंग्रेजों के साथ युद्ध में माथे पर तलवार का घाव लगा था, एक गोली सीने में लगी थी।

लाखों अंग्रेजो की नीद उड़ा दी 
अंग्रेज लक्ष्मीबाई को जिन्दा पकड़ना चाहते थे। लेकिन रानी नाना साहब, तात्या टोपे के साथ सुरंग के रास्ते ग्वालियर के लिए रवाना हो गईं। वह ग्वालियर तो पहुंच गई, लेकिन सहायता न मिलने पर लौटते समय भांडेर के पास अंग्रेजों से मुकाबले में गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुंदरता, चालाकी और दृढ़ता के लिए उल्लेखनीय तो थी हीं साथ ही साथ विद्रोही नेताओं में वह अकेली 'मर्द' थीं। इसी कारण इन्हें मर्दानी भी कहा जाता था।