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सूर्य ग्रहण क्यों लगता है? | Surya Grahan Kyu Lagta Hai



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विज्ञानं की दृस्टि से जब पृथ्वी एवं सूर्य के मध्य में चन्द्रमा आ जाता है तब सूर्य ग्रहण लगता है। इससे चन्द्रमा के पीछे सूर्य कुछ समय के लिए ढक जाता है और धरती से देखने पर चन्दमा काला दिखाई देता है। इसी घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। 

जिस प्रकार पृथ्वी सूर्य के चक्र लगाती है ठीक उसी प्रकार चंद्रमा भी पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है। ऐसे में बहुत बार चाँद सूरज के आगे आ जाता है और पृथ्वी - चंद्रमा - सूर्य तीनों सीध में आ जाते है। ऐसे में धरती से सूर्य साफ दिखाई नहीं देता और चाँद काले रंग का दिखाई देता है। जिसे आम भाषा में सूर्य ग्रहण बोलते है। 

सूर्य ग्रहण कैसे लगता है ?

खण्ड ग्रहण क्या होता है ?
ज्यादातर चाँद सूर्य के कम हिस्से को ही ढकता है। जब चाँद सूर्य के छोटे भाग को ही ढकता है तो इस परिस्थति को खण्ड ग्रहण बोला जाता है। 

पूर्ण सूर्य ग्रहण क्या होता है ?
बहुत कम बार ऐसा नजारा देखने को मिलता है जब चाँद पूर्ण रूप से सूर्य के आगे आ जाता है एवं धरती पर चारो तरफ अंधेरा हो जाता है। दिन के उजाले में भी रात के तारे नजर आने लगते है। पशु - पक्षी सब वापस अपने बसेरें की तरफ लौटने लगते है। इसे पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते है। पूर्ण ग्रहण के समय चाँद को सूर्य के आगे से निकलने में करीब 2 से 2 : 30 घंटो का समय लगता है। इस परिस्थति में चाँद पूर्ण रूप से सूर्य को ज्यादा से ज्यादा 7 मिनट तक ही ढकता है। इस वक्त में दिन में रात जैसा नजारा दिखाई पड़ता है। 

जानिए ज्योतिष विज्ञानं और ग्रहण का संबन्ध 
ग्रहण ब्रह्माण्ड की एक अनोखी और अदभुत घटना है। ज्योतिष शास्त्र में ग्रहो को मानव के जीवन का अंग माना है। आसमानी घटनाओ को मानव और पृथ्वी के भविष्य से जोड़ा है। ज्योतिष में ग्रहण का बहुत अधिक महत्व है साथ ही साथ इस वक्त बहुत से नियमों के पालन का भी संदेश दिया गया है। मनुष्य के जीवन की शुभ - अशुभ घटनाओं को इन ग्रह नक्षत्रों से जोड़ के देखा जाता है। 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण में सूर्य ग्रहण का महत्व 
ग्रहण को लेकर सभी की अलग - अलग अवधारणाएँ होती है। ऐसे में वैज्ञानिको के लिए यह समय किसी त्यौहार से कम नहीं है। क्योकि इसी समय अंतरिक्ष में लाखों घटनाए घटित होती है। जिनका वैज्ञानिको को काफी समय से इंतजार होता है। 

1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक नें सूर्य ग्रहण के अवसर पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल में हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था। आईन्स्टीन का यह प्रतिपादन भी सूर्य ग्रहण के अवसर पर ही सही सिद्ध हो सका, जिसमें उन्होंने अन्य पिण्डों के गुरुत्वकर्षण से प्रकाश के पडने की बात कही थी। चन्द्रग्रहण तो अपने संपूर्ण तत्कालीन प्रकाश क्षेत्र में देखा जा सकता है किन्तु सूर्यग्रहण अधिकतम 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौडे क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। 

भारतीय वैदिक काल के लोगों को जानकारी थी ग्रहण के बारे में 
ईसा से चार हजार वर्ष पूर्व भी भारत के लोगो के पास अदभुत ज्ञान था। ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के परिवार के पास यह ज्ञान उपलब्ध था। वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक पूर्वजों के इस महान ज्ञान को प्रतिविम्बित करता है। ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी।  महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे। ऋग्वेदीय प्रकाश काल अर्थात वैदिक काल से ग्रहण पर अध्ययन, मनन और परीक्षण होते चले आए हैं। पुराणों और वेदो में भी ग्रहण के बारे में ऋषि-मुनियों के बहुत से कथन दिए मिलते है। इसी कारण ग्रहण का महत्व सभी प्रकार से कई अधिक बढ़ जाता है।  

 

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