बौद्ध धर्म के संस्थापक एवं इतिहास और गौतम बुद्ध का जीवन परिचय || Baudh Dharm Ka Itihas || Gautam Buddha Ki Jivani



Gautam Buddha Story in hindi, History of Buddhism in Hindi - बौद्ध धर्म के संस्थापक एवं इतिहास और गौतम बुद्ध का जीवन परिचय | Baudh Dharm Ka Itihas  -  Gautam Buddha Ki Jivani - आज हम बौद्ध धर्म के बारे में समझगे की बौद्ध धर्म के क्या नियम और सिद्धांत है। ( About Buddha in Hindi ) आज हम जानेगे की आखिर बौद्ध धर्म एक नया धर्म क्यों बना, कैसे इसकी उतप्ति हुई एवं इसके संस्थापक कौन है। Lord Gautama Buddha Life History In Hindi

दोस्तों इस धर्म को समझने से पहले हम गौतम बुद्ध के बारे में जानेगे और समझेंगे क्योकि भगवान गौतम बुद्ध के द्वारा ही इस धर्म की उत्पत्ति हुई है।  
Baudh Dharm Ka Itihas || Gautam Buddha Ki Jivani

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड को आधार न मानकर जीवन को आधार माना है। उनकी शिक्षाओं से हमें सुख - दुःख से ऊपर कैसे उठे और अपने जीवन को सही ढंग से कैसे जिए इन सभी के बारे में हमें जानकारी मिलती है।  

हिन्दू धर्म में बुद्ध को भगवान विष्णु का 9वा अवतार माना है। जब आप आगे महाजनपद काल पढोगे तो उस समय बहुत से राजा - महाराजा बौद्ध और जैन धर्म को मानते थे। इसलिए अगर आप कॉम्पिटिशन एग्जाम की तैयारी कर रहे हो तो बौद्ध धर्म के इतिहास के टॉपिक को बिना समझे आप आगे नहीं बढ़ सकते। सबसे पहले आपको इसे जानना ही होगा तो आइये जानते है बौद्ध धर्म के बारे में 

बौद्ध धर्म || सम्पूर्ण जानकारी || तथ्य || Gautam Buddha Story in hindi

जन्म : 563 ई. में कपिलवस्तु में (नेपाल की तराई में स्थित)

शरीर त्याग : 483 ई. में कुशीनारा में (देवरिया उ. प्र.)

ज्ञान प्राप्ति - बौद्ध गया में 

प्रथम उपदेश - सारनाथ स्थित मृगदाव में 

महात्मा बुद्ध के जीवन से जुडी शब्दावली (Life Story of Buddha in Hindi)

गृहत्याग - महाभिनिष्क्रमण 

प्रथम उपदेश - धर्मचक्रप्रवर्तन 

ज्ञानप्राप्ति - सम्बोधि 

संघ में प्रविष्ट होना - उपसम्पदा 

मृत्यु - महापरिनिर्वाण 

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय (Biography of Mahatma Buddha in hindi) 

गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में 563 ई. पू. हुआ था। इनके बच्पन का नाम सिद्धार्थ था।इनके पिता का नाम राजा शुद्धोधन एवं माता का नाम महामाया (मायादेवी) था। इनके पिता शाक्य कुल के मुखिया थे। सिदार्थ की माता कोशलन वंश से थी। इनकी माता जिन्होंने इन्हे जन्म दिया था वह जन्म के ठीक सातवे दिन चल बसी थी, महामाया का निधन सिद्धार्थ के जन्म के सातवें दिन हुआ था। 


शाक्य कुल के होने के कारण इनका नाम शाक्य मुनि भी है। सिद्धार्थ की माता के देहांत के बाद इनका लालन - पालन उनकी उपमाता गौतमी प्रजापति ने किया था एवं इसीलिए सिद्धार्थ को गौतम भी कहा जाता था। 

 राजकुमार सिद्धार्थ के जन्म के समय उनके पिता राजा शुद्धोधन ने बहुत से पंडित और ब्रह्मणों को अपने यहाँ महल में भोजन के लिए और राजकुमार की कुंडली देखने के लिए आमंत्रण किया था। ऐसे में बहुत से विद्वान ब्राह्मण उनके दरबार में अतिथि के रूप में आए थे उनमे से एक थे ब्राह्मण कौण्डिल्य ऋषि, सभी ब्रहमणो ने गौतम को लेकर हैरान कर देने वाली भविष्यवाणीया की थी किसी का कहना था की यह बालक बहुत बड़ा सम्राट बनेगा तो किसी का कहना था की यह बहुत बड़ा सन्यासी बनेगा ऐसे में कुछ ब्राह्मणो का मत था की यह सम्राट भी बन सकता है या तपस्वी भी लेकिन उसी सभा में मौजूद जब कौण्डिल्य ऋषि से सिद्धार्थ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ बता दिया की यह बालक आगे चलकर बहुत बड़ा सन्यासी बनने वाला है और पूरी पृथ्वी को एक नई ज्ञान की किरण दिखाएगा लोग इसे गौतम बुद्ध के नाम से जानेंगे, लेकिन दुःख की बात यह है की जब यह बुद्ध बनेगा तब में इस धरा पर नहीं होऊंगा और न ही इनके सानिध्य में ज्ञान प्राप्त कर पाउँगा। 

ऐसा सब जानकर सिद्धार्थ के पिता बहुत ज्यादा चिंता से घिर गए आखिर कौन पिता चाहता है अपने बेटे को सन्यासी बनते देखना। यह चिंता उन्हें दिन रात सताने लगी और उन्होंने फैसला लिया की सिद्धार्थ को केवल महल में ही रखा जाएगा बाहर इधर - उधर नहीं जाने दिया जायेगा और न ही कोई महल में साधु सन्यासी आएगा और सभी वृद्ध और बीमार लोग महल से बाहर एक अलग नगर में रहेंगे। 


राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए तीन महल बनाए। सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए। पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं।

एक बार नगर में विचरण करते हुए उन्होंने चार निम्न घटनाओ को देखा यथा एक वृद्ध पुरुष को, एक बीमार व्यक्ति को, एक मृत शरीर को और एक तपस्वी मुनि को, ऐसे में उनका मन इन घटनाओ के बाद तपस्या और ज्ञान प्राप्ति के लिए अग्रषित हुआ।  


सिर्फ 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने अपना ग्रह त्याग कर दिया एवं अपने घोड़े और सारथी के साथ वह घर से निकल गए। कुछ दूर यात्रा करने के बाद उन्होंने अपने सारथी को धन्यवाद दिया और अकेले ही आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े। ऐसे में उनके जाने के बाद उनका घोडा काफी बीमार रहने लगा और कुछ ही दिन बाद उसकी मृत्यु भी हो गई। सिद्धार्थ के एक पुत्र भी था जिसका नाम राहुल था अभी वह काफी छोटा था और सिद्धार्थ की प्रिय पत्नी का नाम यशोधरा था। सिद्धार्थ ने जिस समय ग्रह त्याग किया उस समय उनकी पत्नी और पुत्र सभी नींद में सो रहे थे। Gautam Buddha Updesh in hindi


- वे 6 वर्ष तक मगध में ही विचरण करते रहे एवं इस दौरान उन्होंने साधना भी की थी। सिदार्थ ने योग की शिक्षा आलार कलाम से सीखी थी। 

- उन्हें 35 वर्ष की आयु में निलजन नदी के किनारे बौद्ध गया में एक पीपल के पेड़ के नीचे पूर्णिमा के दिन पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ था। अतः शिक्षा प्राप्त होने के पश्चात उन्हें बुद्ध के नाम से सम्बोधित किया गया। 

- सिद्धार्थ ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में अपने पांच अनुयायियों को दिया। इनके प्रथम उपदेश को धर्मचक्रप्रवर्तन कहा सूत कहा गया। 

भगवान गौतम बुद्ध से ज्ञान प्राप्त करने वाले उन पांच अनुयायियों का नाम इस प्रकार है 

(1) असाजी
(2) मोगलन 
(3) उपालि 
(4) सरिपुत्त 
(5) आनंद 

- महात्मा बुद्ध के अधिकतम उपदेश श्रवस्ती में ही दिए गए थे। इनके जीवन की चार प्रमुख घटनाएं थी - महाभिनिष्क्रमण, निर्वाण, चक्र परिवर्तन, महापरिनिर्माण 

- बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्माण कहा जाता है। इनकी मृत्यु 80 वर्ष की उम्र में 483 ई.पू. में कुशीनगर में हुई थी। 

- शवदाह के बाद बुद्ध की अस्थियो को आठ कबीलो में वितरित किया गया था। इन अस्थियों को ताबूतों में बंद करके उनके ऊपर स्तूप बना दिए गए यथा साँची के स्तूप 

- गौतम बुद्ध के अंतिम शब्द थे 'सभी सम्रग बातो को ध्यान में रखते हुए अपने उद्धार के लिए लग्न से प्रयास करे।   

बौद्ध धर्म के अनुसार आर्य सत्य चार हैं 
 
(1) दुःख
(2) दुःख-समुदाय
(3) दुःख-निरोध
(4) दुःखनिरोध-गामिनी
 
पहला आर्य सत्य दुःख है। जन्म दुःख है, जरा दुःख है, व्याधि दुःख है, मृत्यु दुःख है, अप्रिय का मिलना दुःख है, प्रिय का बिछुड़ना दुःख है, इच्छित वस्तु का न मिलना दुःख है। यह दुःख नामक आर्य सत्य परिज्ञेय है। संक्षेप में रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान, यह पंचोपादान स्कंध (समुदाय) ही दुःख हैं।
 
दुःख समुदय नाम का दूसरा आर्य सत्य तृष्णा है, जो पुनुर्मवादि दुःख का मूल कारण है। यह तृष्णा राग के साथ उत्पन्न हुई है। सांसारिक उपभोगों की तृष्णा, स्वर्गलोक में जाने की तृष्णा और आत्महत्या करके संसार से लुप्त हो जाने की तृष्णा, इन तीन तृष्णाओं से मनुष्य अनेक तरह का पापाचरण करता है और दुःख भोगता है। यह दुःख समुदाय का आर्य सत्य त्याज्य है।
 
तीसरा आर्य सत्य दुःखनिरोध है। यह प्रतिसर्गमुक्त और अनालय है। तृष्णा का निरोध करने से निर्वाण की प्राप्ति होती है, देहदंड या कामोपभोग से मोक्षलाभ होने का नहीं। यह दुःखनिरोध नाम का आर्य सत्य साक्षात्करणीय कर्तव्य है।
 
चौथा आर्य सत्य दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् है। यह दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् नामक आर्य सत्य भावना करने योग्य है। 

इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। वे अष्टांग ये हैं 

1. सम्यक्‌ दृष्टि, 2. सम्यक्‌ संकल्प, 3. सम्यक्‌ वचन, 4. सम्यक्‌ कर्मांत, 5. सम्यक्‌ आजीव, 6. सम्यक्‌ व्यायाम, 7. सम्यक्‌ स्मृति, 8. सम्यक्‌ समाधि।
 
दुःख का निरोध इसी अष्टांगिक मार्ग पर चलने से होता है। इस ‘आर्यसत्य’ से मेरे अंतर में चक्षु, ज्ञान, प्रज्ञा, विद्या और आलोक की उत्पत्ति हुई। जबसे मुझे इन चारों आर्य सत्यों का यथार्थ सुविशुद्ध ज्ञानदर्शन हुआ मैंने देवलोक में, पमारलोक में, श्रवण जगत और ब्राह्मणीय प्रजा में, देवों और मनुष्यों में यह प्रकट किया कि मुझे अनुत्तर सम्यक्‌ सम्बोधि प्राप्त हुई और मैं अभिसंबुद्ध हुआ, मेरा चित्त निर्विकार और विमुक्त हो गया और अब मेरा अंतिम जन्म है।
 
परिव्राजक को इन दो अंतों (अतिसीमा) का सेवन नहीं करना चाहिए। वे दोनों अंत कौन हैं? पहला अंत है काम-वासनाओं में काम-सुख के लिए लिप्त होना। यह अंत अत्यंतहीन, ग्राम्य, निकृष्टजनों के योग्य, अनार्य्य और अनर्थकारी है। दूसरा अंत है शरीर को दंड देकर दुःख उठाना। यह भी अनार्यसेवित और अनर्थयुक्त है। इन दोनों अंतों को त्याग कर मध्यमा प्रतिपदा का मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) ग्रहण करना चाहिए। यह मध्यमा प्रतिपदा चक्षुदायिनी और ज्ञानप्रदायिनी है। इससे उपशम, अभिज्ञान, संबोधन और निर्वाण प्राप्त होता है। 

बौद्ध साहित्य के बारे में सम्पूर्ण जानकारी 

- इसे पाली साहित्य के नाम से भी जाना जाता है। 

- बौद्ध धर्म के त्रिपिटक है - (1) सुत पिटक (2) विनय पिटक (3) अभिधम्म पिटक 

- त्रिपिटक यह बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथ है। 

- सुतपिटक में बुद्ध की शिक्षाये एवं बुद्ध के दिए गए सभी उपदेशो का संकलन है। 

- संघ एवं भिक्षुओं से संबंधित सभी प्रकार के नियम हमें विनयपिटक से मिलते है। 

- बौद्ध धर्म के सिद्धांत हमे अभिधम्मपिटक से मिलते है। 

- सुत पिटक का एक लघु भाग जातक कथाओं से संबंधित है। इनमें गौतम बुद्ध के पिछले 550 जन्म की कहानियाँ मौजूद है जो बेहद ही शिक्षापद भी है। 
- दीपवंश एवं महावंश श्री लंकाई पुस्तकों के रूप में जानी जाती है। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र और पुत्री को श्री लंका भेजा था जहाँ इन पुस्तकों का संकलन हुआ था। 

- मिलिन्दपन्हो भी बौद्ध धर्म से संबंधित एक अतिमहत्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक में राजा मिनेण्डर (मिलिंद) एवं नागसेन बौद्ध भीक्षु के मध्य वार्तालाप का विवरण दिया गया है। मिलिंद ने नागसेन बौद्ध भीक्षु के समक्ष बहुत से प्रश्न रखे थे जिनका जवाब नागसेन ने दिया था। 

- एक और पुस्तक अश्वघोष द्वारा लिखित संस्कृत भाषा में बुद्ध चरित्र है जो की बुद्ध के जीवन पर आधारित पुस्तक है।   

बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय 

बौद्ध धर्म के 3 निम्नलिखित सम्प्रदाय है। - हीनयान, महायान, वज्रयान 

1. हीनयान 

हीनयान एक रूढ़िवादी समूह है। इस सम्प्रदय में बुद्ध की तमाम शिक्षाओं का सख्ती से पालन करना होता था। यह सम्प्रदय मोक्ष पर ज्यादा जोर देता था। हीनयान सम्प्रदाय में मूर्ति पूजा की आज्ञा नहीं होती थी। यह सम्प्रदाय मुख्यतय मगध, श्रीलंका एवं बर्मा में प्रसिद्ध था। 

2. महायान 

यह एक व्यापक दृष्टिकोण वाला सम्प्रदाय था। यह आत्मा में विश्वास करता था। यह बोधिसत्व को मानने वाला सम्प्रदाय था। यह लोग मूर्ति के द्वारा बुद्ध की पूजा करने लगे थे। इन्होंने संस्कृत में शास्त्र लिखें जिन्हें वेपुलसीसूत्र कहा जाता है। कनिष्ट बौद्ध धर्म के महायान शाखा का समर्थक था। 

3. व्रजयान 

यह सम्प्रदाय आलौकिक शक्तियों, तंत्र - मंत्र, चमत्कार आदि में आस्था रखता था। यह 10 शताब्दी ईसवी के दौरान पूर्वी भारत में खूब फैला था। पलास वज्रयान सम्प्रदाय का अनुयायी था। 

बौद्ध धर्म की वास्तु कला के बारे में सम्पूर्ण जानकारी 

स्तूप - यह एक अर्द्ध - गोलाकार सरचना होती है। सम्राट अशोक का बनाया स्तूप सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है जो साँची (उत्तरप्रदेश) में स्थति है। 

चैत्य - ये गुफाओं को काट कर उनके अंदर बनाए गए बौद्ध मंदिर होते थे। उदाहरण - कार्ले की गुफा (नासिक के पास)

विहार - बौद्ध विहार ये इमारते साधुओ और भिक्षुओ के लिए आवास के रूप में बनाई गई थी। पहला विहार कुमारगुप्त द्वारा नालंदा में बनाया गया था। जिसे नालंदा महाविहार के नाम से भी जाना जाता। है 

बौद्ध संगीतियाँ सम्पूर्ण जानकारी

प्रथम - 483 ई. पू. स्थान - राजगृह, अजातशत्रु द्वारा - इस समय विनय पिटक और सुतपिटक का संकलन हुआ था। 

द्वितीय - 383 ई. पू. स्थान - वैशाली, कालाशोक द्वारा - इस समय बौद्ध धर्म के अनुयायी स्थविरवद एवं महासंघिक में विभाजित हो गए थे। 

तृतीय - 250 ई. पू. स्थान - मगध , सम्राट अशोक के द्वारा - इस समय अधिध्म्म पिटक का संकलन हुआ था। 

चतुर्थ - 100 ई. पू.स्थान - कुण्डलवन (कश्मीर), कनिष्ट के द्वारा - इस समय बौद्ध धर्म का हीनयान और महायान में विभाजन हुआ था।  


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