जैन धर्म के संस्थापक एवं इतिहास और महावीर स्वामी का जीवन परिचय || Jain Dharm Ka Itihas || Mahavir Swami Ki Jivani



Mahavir Swami Story in hindi, History of Jainism in Hindi - जैन धर्म के संस्थापक एवं इतिहास और महावीर स्वामी का जीवन परिचय | Jain Dharm Ka Itihas  - Jain Dharm Ki Jivani - आज हम जैन धर्म के बारे में समझगे की जैन धर्म के क्या नियम और सिद्धांत है। ( Jain Dharm Ke 24 Tirthankar Or Naam - जैन धर्म और 24 तीर्थंकर !! ) आज हम जानेगे की आखिर जैन धर्म एक नया धर्म क्यों बना, कैसे इसकी उतप्ति हुई एवं इसके संस्थापक कौन है। Lord Mahavir Swami Life History In Hindi

जैन धर्म 6वी शताब्दी में उदित हए उन 62 नवीन धार्मिक में से एक था। परंतु अंत में उनमे से ज्यादा विकसित और प्रसिद्ध जैन धर्म और बौद्ध धर्म ही हुए। 
Jain Dharm Ka Itihas

6वी शताब्दी ईसा पूर्व भारत में उदित हुए प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय निम्लिखित है - 

1. जैन धर्म (वर्धमान महावीर - वास्तविक संस्थापक)

2. बौद्ध धर्म (महात्मा गौतम बुद्ध)

3. आजीवक सम्प्रदाय (मकखली गोशाल)

4. भौतिकवाद (पकुद कचायन)

5. घोर अक्रियावादी (पूरण कश्यप)

6. सनक सम्प्रदाय (निंबराक)

7. रूद्र सम्प्रदाय (विष्णुस्वामी वलभाचार्य)

8. ब्रह्म सम्प्रदाय (आनंद तीर्थ)

9. राम भक्त सम्प्रदाय (रामानंद)

10. वैष्णव सम्प्रदय (नागार्जुन)

11. परमार्थ सम्प्रदाय (रामदास)

ऊपर दिए गए कुछ 62 में से वो महत्वपूर्ण सम्प्रदाय है जो छठवी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत की धरती पर खूब फैले और मनुष्य के जीवन के सभी दुःखो का निवारण करने का प्रयास किया गया। 

यह बात तो सभी जानते ही है की जैन धर्म विश्व के सबसे प्राचीन धर्मो में से एक है। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर है जिनका अपना - अपना विशेष योगदान है। मगर पूर्णयतय वर्धमान महावीर स्वामी को ही जैन धर्म के संस्थापक माना जाता है। 

जैन शब्द की उत्पत्ति जिन शब्द से हुए है "जिन का अर्थ होता है अपनी इन्द्रियों को जितने वाला"  और जो जिन की अनुयायी होते है उन्हें जैन कहते है।  'जिन' शब्द बना है संस्कृत के 'जि' धातु से। 'जि' माने - जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी तन मन वाणी को जीत लिया और विशिष्ट आत्मज्ञान को पाकर सर्वज्ञ या पूर्णज्ञान प्राप्त किया उन आप्त पुरुष को जिनेन्द्र या जिन कहा जाता है'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्म।


जैन ईश्वर को मानते हैं जो सर्व शक्तिशाली त्रिलोक का ज्ञाता द्रष्टा है पर त्रिलोक का कर्ता नही | जैन धर्म में जिन या अरिहन्त और सिद्ध को ईश्वर मानते हैं। अरिहंतो और केवलज्ञानी की आयुष्य पूर्ण होने पर जब वे जन्ममरण से मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त करते है तब उन्हें सिद्ध कहा जाता है। उन्हीं की आराधना करते हैं और उन्हीं के निमित्त मंदिर आदि बनवाते हैं। जैन ग्रन्थों के अनुसार अर्हत् देव ने संसार को द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि बताया है। जगत का न तो कोई कर्ता है और न जीवों को कोई सुख दुःख देनेवाला है। अपने अपने कर्मों के अनुसार जीव सुख दुःख पाते हैं। 

जीव या आत्मा का मूल स्वभान शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदमय है, केवल पुदगल या कर्म के आवरण से उसका मूल स्वरुप आच्छादित हो जाता है। जिस समय यह पौद्गलिक भार हट जाता है उस समय आत्मा परमात्मा की उच्च दशा को प्राप्त होता है। जैन मत 'स्याद्वाद' के नाम से भी प्रसिद्ध है। स्याद्वाद का अर्थ है अनेकांतवाद अर्थात् एक ही पदार्थ में नित्यत्व और अनित्यत्व, सादृश्य और विरुपत्व, सत्व और असत्व, अभिलाष्यत्व और अनभिलाष्यत्व आदि परस्पर भिन्न धर्मों का सापेक्ष स्वीकार। इस मत के अनुसार आकाश से लेकर दीपक पर्यंत समस्त पदार्थ नित्यत्व और अनित्यत्व आदि उभय धर्म युक्त है।

तीर्थंकर शब्द का जैन धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। 'तीर्थ' का अर्थ है, जिसके द्वारा संसार समुद्र तरा जाए, पार किया जाए और वह अहिंसा धर्म है। जैन धर्म में उन 'जिनों' एवं महात्माओं को तीर्थंकर कहा गया है, जिन्होंने प्रवर्तन किया, उपदेश दिया और असंख्य जीवों को इस संसार से 'तार' दिया। इन 24 तीर्थंकरों ने अपने-अपने समय में धर्ममार्ग से च्युत हो रहे जन-समुदाय को संबोधित किया और उसे धर्ममार्ग में लगाया। इसी से इन्हें धर्ममार्ग और मोक्षमार्ग का नेता तीर्थ प्रवर्त्तक 'तीर्थंकर' कहा गया है। जैन सिद्धान्त के अनुसार 'तीर्थंकर' नाम की एक पुण्य कर्म प्रकृति है। उसके उदय से तीर्थंकर होते और वे तत्त्वोपदेश करते हैं। जो स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान (केवल ज्ञान) प्राप्त करते है। जो संसार सागर से पार लगाने वाले तीर्थ की रचना करते है, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। तीर्थंकर वह व्यक्ति हैं जिन्होनें पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा, आदि पर विजय प्राप्त की हो।


जैन धर्म में 24 तीर्थंकर माने गए हैं। उन चौबीस तीर्थंकरों के नाम इस प्रकार प्रसिद्ध हैं-

1.ॠषभनाथ ,

2.अजितनाथ

3.सम्भवनाथ

4.अभिनन्दननाथ

5.सुमतिनाथ

6.पद्मप्रभ

7.सुपार्श्वनाथ

8.चन्द्रप्रभ

9.पुष्पदन्त

10.शीतलनाथ

11.श्रेयांसनाथ

12.वासुपूज्य

13.विमलनाथ

14.अनन्तनाथ

15.धर्मनाथ

16.शान्तिनाथ

17.कुन्थुनाथ

18.अरनाथ

19.मल्लिनाथ

20.मुनिसुब्रनाथ

21.नमिनाथ

22.नेमिनाथ

23.पार्श्वनाथ

24.वर्धमान महावीर 

जैन धर्म के अनुसार समय का आदि या अंत नहीं है। वह एक गाड़ी के पहिए के समान चलता है। हमारे वर्तमान युग के पहले अनंत संख्या मे समय चक्र हुए है और इस युग के बाद भी अनंत संख्या मे समय चक्र होंगें। इक्कीसवी सदी के आरंभ में, हम वर्तमान अर्ध चक्र के पांचवें दौर में लगभग 2530 वें वर्ष में हैं।

जैन धर्म का मूल मंत्र - अहिंसा परमो धर्मः

वर्धमान महावीर स्वामी : एक संक्षिप्त परिचय

जन्म : कुंडलग्राम 

जन्म का वर्ष : 540 ईसा पूर्व 

पिता : सिद्धार्थ 

माता : त्रिशला (लिन्छवि शासक चेटक की बहिन)

पत्नी : यशोदा 

पुत्री : अनोज्जा प्रियदर्शीनी 

भाई : नंदी वर्धन 

गृहत्याग : 30 वर्ष की उम्र में 

तपकाल : 12 वर्ष तक 

तपस्थल : जम्बीग्रम (ऋजुपलिका नदी के किनारे) में एक साल वृक्ष 

कैवल्य : ज्ञान की प्राप्ति 42 वर्ष की अवस्था में 

निर्वाण : 468 ईसा पूर्व में 72 वर्ष की आयु में पावा में 

धर्मोपदेश देने की अवधि : 12 वर्ष 

- महावीर स्वामी जैन धर्म के सस्थांपक माने जाते है जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। 

- जैन परम्परा में धर्म गुरुओं को तीर्थंकर कहा जाता है तथा इनकी संख्या 24 है। 

- महावीर स्वामी इस धर्म के अंतिम और 24 वे तीर्थंकर है। 

- महावीर स्वामी के निधन के बाद 200 वर्षो के पश्चात मगध में एक भीषण आकाल पड़ा था। 

जैन धर्म के त्रिरत्न 

1. सम्यक श्रदा - सत्य में विश्वास 
2. सम्यक ज्ञान - शंकावहिन एवं वास्तविक ज्ञान 
3. सम्यक आचरण - ब्राह्य जगत के प्रति उदासीनता 

जैन धर्म से संबंधित कुछ अतिमहत्वपूर्ण पर्वत -

कैलाश पर्वत - ऋषभदेव का शरीर त्याग  

सम्मेद पर्वत - पाश्वनाथ का शरीर त्याग 

माउंट आबू पर्वत - दिलवाड़ा का जैन मंदिर 

शत्रुंजय पहाड़ी - अनेक जैन मंदिर 

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