Gupt Bharat Ki Khoj Hindi Edition eBook - गुरु की तलाश में यूरोप से आए एक व्यक्ति की रहस्यमयी कहानी | Ramana Maharshi Hindi Books गुप्त भारत की खोज : Paul Brunton Books in Hindi PDF



Gupt Bharat Ki Khoj (Hindi Edition) eBook in Hindi - गुरु की तलाश में यूरोप से आए एक व्यक्ति की रहस्यमयी कहानी | Ramana Maharshi Hindi Books गुप्त भारत की खोज : Paul Brunton Books in Hindi PDF


यह कहानी करीब 100 साल पुरानी यानी की 20वी सदी की कहानी है। उस समय भारत आज के जैसे नहीं था और न ही भारत के लोग ऐसे थे। उस समय भारत की गली - गली में बड़े - बड़े साधु संतो का डेरा जमा रहता था। जगह - जगह पर मेले लगते थे। मोटर कार का जमाना बस आया ही था कुछ अमीर गिने चुने लोगो के पास गाड़िया होती थी। यह तो भारत की बात है अब में मेरे देश लंदन के बारे में भी कहानी शुरू करने से पहले आपको कुछ बता देता हूँ। 


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Gupt Bharat Ki Khoj Hindi Edition eBook - गुरु की तलाश में यूरोप से आए एक व्यक्ति की रहस्यमयी कहानी 

मेरा नाम पॉल ब्रन्टन है में लंदन से हूँ। मेरा जन्म 21 अक्टूबर 1898 को लंदन में ही हुआ था। लंदन अब तेजी से बदल रहा है यहाँ लोग सभी अपने - अपने काम - काज में ही व्यस्त रहते है। हमारी वेशभूषा भारत से काफी अलग है हम हर समय एक बड़ा सा कोट और सर पर एक टोपी पहने रखते है यह हमारी संस्कृति से जुड़ा पहनावा है। हम पैरो में जूते पहनते है एवं कभी - कभी गले में टाई भी लगा लेते है। में एक पत्रकार हूँ साथ ही साथ मुझे भारत से भी काफी लगाव है। क्योकि में भारत की तमाम कहानियों के बारे में पढ़ता ही रहता हूँ और में जल्द भारत भी जाना चाहता हूँ ताकि में भारत की वास्तविकता को समझ पाऊ। 


एक दिन अचानक मुझे मौका मिल ही जाता है और में समुंद्र के मार्ग से होता हुआ भारत पहुंच जाता हूँ। असल में भारत आने का मेरा उद्श्य अपने गुरु को ढूंढना है और उनसे सच्चा ज्ञान प्राप्त करना है। देखते है क्या भारत की भूमि पर मुझे कोई ऐसा गुरु मिल पाएगा जो मेरे मन में उठ रहे हजारो सवालों को शांत कर सके। 


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मेरी तलाश मेरे भारत आते ही शुरू हो गई थी। यहाँ में अनेक बाबाओं, साधु - संतो के से मिला था। लेकिन मुझे अभी तक किसी में वह विचार वह शक्ति नहीं देखने को मिली जिसके लिए में यहाँ पर आया था। अब में मेरी खोज को और अधिक समय भी देने लगा हूँ ताकि जल्द से जल्द में मेरे आध्यात्मिक गुरु से मिल पाऊ। 


में भारत में अड्यार नदी के एक सन्यासी से भी मिला था उन्होंने मुझे बहुत से उपदेश भी दिए है जो मुझे अच्छी तरह से याद भी है। में सन्यासी से उनके घर पर और नदी के किनारे बातचीत करता था और भारत की आध्यात्मिक शक्ति और यहाँ के देवी - देवताओं के बारे में जान रहा था। इस सन्यासी ने मुझे योग के बारे में भी बताया की कैसे योग के द्वारा शरीर की चेतना तक पहुँचा जा सकता है। इनसे मुलाकात के बाद अब में आगे अपनी यात्रा की और बढ़ गया हूँ। 


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में एक भारत के अदभुत बाबा से मिलने जा रहा हूँ जिन्हे यहाँ सभी मौनी बाबा के नाम से जानते है कहा जाता है की इनको किसी ने भी एक बार भी बात करते एवं बोलते नहीं देखा है यह हमेशा ध्यान में रहते है और जब भी ध्यान से जागते है तो मौन ही रहते है। यह बाबा मुझे काफी अजीब से लगे मेरी पहली मुलाकात में यह एक खंडर घर में ध्यान में लीन बैठे थे। मुझे एक आदमी की मदद से इनके पास लाया गया था। इनके चहरे पर बहुत शान्ति थी। लेकिन इन्होने मुझसे कोई बात नहीं की में अगले दिन फिर उनसे मिलने वहाँ गया तो मेने देखा उनके पास एक पुलिस का आदमी आया हुआ था और किसी के बारे में उनसे पूछ रहा था। शायद वह किसी अपराधी का पता उनसे पूछ रहा होगा ऐसे में बाबा ने स्लेट पर लिख कर उसको पुलिस वाले की मदद की थी। 


अब में भी अपने बारे में जानने के लिए बहुत बेचैन था ऐसे में मेने भी उनको कहा की में मेरे आध्यात्मिक गुरु की तलाश की लिए भारत आया हूँ क्या तुम कोई ऐसे गुरु के बारे में जानते हो जो मेरे सभी सवालों के जवाब दे सके ऐसे में मौनी बाबा ने अपनी स्लेट पर जो लिखा उसे देख कर तो में भी स्तभ एवं हैरान रह गया था। मौनी बाबा ने लिखा था की तुम अपनी मर्जी से भारत नहीं आए हो बल्कि एक ऋषि ने तुम्हे भारत बुलाया है और जल्द ही तुम्हारी उनके साथ मुलाकात भी होगी। यह सब जान कर तो में और अधिक चिंतित हो गया था। 


रात बहुत हो गई थी में मेरे होटल में वापस पहुंच गया था लेकिन मुझे एक सवाल बहुत परेशान कर रहा था की में तो मेरी मर्जी से भारत आया था फिर आखिर मौनी बाबा ने ऐसा मुझे क्यों कहा और वह ऋषि कौन है लेकिन जो भी हो अब सोने का समय हो चूका था अगले दिन फिर मुझे मेरे गुरु की तलाश में निकलना था तो मुझे जल्द ही गहरी नींद आ गई। वैसे में आज बहुत थक भी चूका था। 


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आगे मेने दक्षिण भारत के कई आध्यात्मिक गुरुओ से भी मुलाकात की थी कुछ छोटे - मोठे जादूगरों से भी मेरा सामना हुआ था। लेकिन में उनकी चोरी जानता था क्योकि में पहले से ही एक मिस्र के जादूगर से मिला हुआ था जिसने मुझे बहुत से जादू सीखा दिए थे। लेकिन में इन जादू वाले बाबाओ के लिए भारत नहीं आया था मुझे एक सच्चे संत की तलाश थी जो मेरे सवालों का जवाब दे सके। भारत आने के बाद तो मेरे सवालों की लिस्ट तो अब और ज्यादा बड़ी हो चुकी थी मेरे मन में हजारो सवाल पैदा हो चुके थे जिनसे में भी परेशान था।  


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अब आगे की यात्रा के लिए में यहाँ से निकल रहा हूँ। में पश्चिमी भारत में घूमने निकला हूँ। में बार - बार धूल भरे डब्बों और बिना सीट की बैलगाड़ियों पर घुमंते - घुमंते थक चूका हूँ इसलिए अब मेरे एक पुरानी गाड़ी किराए पर ली है। मेरे साथ एक हिन्दू व्यक्ति है जो की मेरे अच्छे मित्र भी है। वो मेरे वाहनचालक, मित्र और सेवक तीनों की भूमिका निभा रहे है। धीरे - धीरे रात का अंधेरा बढ़ता जाता है। हम एक जंगल से गुजर रहे है इस बिच हम एक जगह रुकने का फैसला लेते है ताकि थोड़ा आराम किया जाए। मेरा साथी रात भर लकड़ियाँ जलाकर उसमे छोटी - छोटी टहनियाँ डालता रहता है। उसने मुझे बताया की आग की लपटों से जंगली जानवर दूर रहते है। आग से उनको डर लगता है। हमे रात को पहाड़ के पास से सियारों के हुकने की तेज आवाजे आती है वे हमारे आस - पास ही है। 


हम जैसे तैसे यहाँ पर अपनी रात गुजरते है। सुबह में मेरी खोज में अब आगे निकल जाता हूँ। जंगल में चलते समय हमें एक सन्यासी दिखाई पढ़ते है उनके चेहरे का तेज दूर तक रोशनी कर रहा है। सन्यासी के पास उनका एक शिष्य भी बैठा है। भारत में इस समय सन्यासी इस घने जंगलो में आसानी से मिल जाते है। 


ऐसे में मेरा मन भी यह कह रहा है क्यों न इनसे मिला जाए एवं बात की जाए। मेरा साथी उनसे मिलने जाता है और थोड़ी देर उनसे बात करता है। काफी समय के पश्चात वो मुझे भी अपने पास बुलाते है। उस सन्यासी वृद्ध व्यक्ति का नाम चंडीदास है। उनके शिष्य के अनुसार वे एक महायोगी है, जिनके पास काफी असाधारण शक्तियाँ मौजूद है। वे लोग गांव - गांव घूम रहे है और उन्होंने अभी तक काफी दुरी भी तय कर ली है। ये लोग करीब 2 साल पहले अपने बंगाल के एक घर से निकले थे। 


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में उनको अपने साथ गाड़ी में चलने को कहता हूँ वे तत्काल मेरे पस्ताव को स्वीकार कर लेते है। योगी के चेहरे पर काफी दया का भाव है मानो वो हमारे आभारी है। आगे चलकर हम एक गांव में पहुंच जाते है और रात यही बिताने का निश्चय करते है। 


यहाँ पर योगी को मेने अपनी सारी खोज के बारे में बता दिया ऐसे में योगी ने मुझे वापस मुंबई जाने के लिए कहा और कहा की जहाँ से तुम्हारी यात्रा शुरू हुई है तुम वही जाओ वही तुम्हारी यह यात्रा खत्म होगी। उन्होंने यह भी कहा की जल्द ही तुम्हारे गुरु तुम्हे अपने पास बुलाने वाले है। ऐसे में, में उनकी बात सुनकर काफी चिंतित हूँ आखिर उस भीड़ - भाड़ वाले शहर में मुझे क्या मिलेगा। में तो पहले ही ऐसे शहरों को छोड़ कर आया हूँ। 


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लेकिन में उनकी बात जल्द ही मान लेता हूँ और मुंबई के लिए रवाना हो जाता हूँ। अगले दिन ही में मेरे मुंबई के उस होटल में पहुंच जाता हूँ जहाँ से मेने भारत भ्रमण की अपनी यह यात्रा शुरू की थी। में अब बहुत ज्यादा उदास महसूस कर रहा हूँ क्योकि मुझे होटल में आए 2 दिन हो गए है और मेरी यह यात्रा अब अधूरी ही रहने वाली है क्योकि अभी तक मुझे वो योगी नहीं मिले जिनकी तलाश में, में यहाँ आया था। 


में अपने आपको काफी थका हुआ भी महसूस कर रहा हूँ। मेने वापस यूरोप जाने का फैसला अब कर लिया है और मेने मेरे जहाज की टिकट भी बुक करवा दी है। 2 दिन बाद मेरा जहाज यूरोप के लिए रवाना होने वाला है। आज रात में होटल में बहुत ही परेशान बैठा हूँ। 


कुछ समय के पश्चात मेरे मन में से आवाज आती है की तुम बड़े ही मुर्ख हो इतनी दूर आने के बाद भी तुमने कुछ नहीं पाया और हार मानकर वापस जा रहे हो। मेरा दिमाग मुझे वापस जाने के लिए समझा रहा है लेकिन मेरा दिल इस बात को बिल्कुल भी नहीं चाहता की में खाली हाथ वापस मेरे देश जाऊ। ऐसे में मेरे दिल ने मुझे समझा दिया की जल्द ही में मेरे गुरु से मिलने वाला हूँ। 


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में यह बाते सोच ही रहा था तभी मेरे दरवाजे पर किसी व्यक्ति की दस्तक होती है और वह मेरे लिए यह पत्र लेकर आता है। इस पत्र के ऊपर मेरे होटल का पता दिया हुआ होता है। पत्र के अंदर उन ऋषि के बारे में लिखा होता है जिनकी तलाश में, में भारत आया हूँ। तुरंत मेरे चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ जाती है। यह पत्र उनके ही एक शिष्य के द्वारा लिखा गया है और उन्होंने मुझे बुलाया है। में काफी हैरान भी हूँ और खुश भी हूँ। में अब ख़ुशी - खुशी चाय पीने के लिए मेरे होटल से बाहर आता हूँ और चाय का आनंद लेता हूँ। 


अब में अगले दिन सुबह जल्दी उठ जाता हूँ। मेरे गाड़ी चालक के साथ में महर्षि के आश्रम में पहुंचने के लिए काफी बेताब हूँ। में शीघ्र ही मुंबई को अलविदा कह कर अपने नए पड़ाव की और निकल जाता हूँ। डकक्न की समतल भूमि पर सैकड़ो मील की यात्रा करने के बाद में अपने मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ। वहाँ की घनी घास एवं बीच - बीच में आने वाले बड़े - बड़े वृक्षों के बीच रेलगाड़ी धीरे - धीरे चल रही है। मुझे लग रहा है की में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर की तरफ आगे बढ़ रहा हूँ। में खिड़की से बाहर देखते हुए यह सोच रहा हूँ की जल्द ही मेरी मुलाकात उस आध्यात्मिक महामानव से होने वाली है जिसका मुझे काफी समय से इंतजार था। 


अगले दिन हमारी रेलगाड़ी मिलों का सफर तय करके दक्षिणी परिदृश्य में प्रवेश करती है। इस समय मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। अब मुझे यात्रा की थकान भी महसूस नहीं हो रही है। 


हमारे जीवन में ऐसे अविस्म्रणीय पल आते है, जो हमारे जीवन के पंचांग में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो जाते है। ऐसा हि क्षण मेरे सामने आ गया है और में महर्षि के   गांव में पहुंच गया हूँ और उनके कक्ष में प्रवेश करने वाला हूँ। 


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वह अपने शानदार बाघ के आसन पर बैठे है। उनके पास मेज पर अगरबत्ती जल रही है और सुगंधित धुआँ कक्ष में चारो और फेल रहा है। वे गहरे आध्यात्मिक ध्यान में डूबे है। में उनके पास बैठ जाता हूँ और उन्हें ही देखता रहता हूँ। थोड़े समय के पश्चात वह अपनी आँखे खोलते है और सजग तरीके से कक्ष के बाहर देखते है फिर वो मुझे देखते है और थोड़ा सा मुस्क़ुरा देते है। 


गुरुदेव के कुछ ही दुरी पर उनके शिष्य भी बैठे है। कक्ष का बाकि सारा स्थान खाली है। में उनका शिष्य बनने यहाँ आया हूँ। उनका चेहरा बहुत ही शांत है मानों उनके मन के भीतर अब कोई प्रश्न बचे ही न हो। में यहाँ बहुत उम्मीद लेकर आया हूँ ऐसे में मुझे जब तक चेन नहीं मिलेगा जब तक में इनका शिष्य नहीं बन जाता। मेने इनके बारे में काफी कुछ अन्य योगियों से भी सुन रखा है। 


मेने शिष्य बनने के लिए उनसे अनुरोध कर दिया है ऐसे में वे मेरी और देख कर मुस्कराते है और कहते है - "जिसने स्वम को जान लिया, उसके लिए न कोई गुरु है और न कोई शिष्य है। ऐसा व्यक्ति सभी को समान दृष्टि से ही देखता है। " 


फिर महर्षि कहते है - "तुम्हें अपना गुरु अपने भीतर ही तलाशना होगा" 


अब मुझे उनकी बात धीरे - धीरे समझ में आने लगी है वे मुझे से डाइरेक्ट अंग्रेजी में ही बात कर रहे है। में रमण महर्षि के आश्रम में कई दिन रुकता हूँ ऐसे में, में अपने गुरु के साथ काफी समय बिताता हूँ। मुंबई आने तक मेरे मन में हजारो की संख्या में सवाल थे जो अब न जाने कहा खो गए है। अब में उनके पास बैठता हूँ तो मेरा मन एक दम शांत और बिना सवालों के होता है। ऐसे में, में शायद आध्यात्मिक की दुनियाँ में आगे बढ़ चूका हूँ। यहाँ रमन महर्षि के शिष्यों के साथ भी मेरी अच्छी दोस्ती हो गई है। मेने मेरे कैमरे से काफी तस्वीरें भी यादगार के तोर पर ली है। ताकि में अपने देश जाकर इस समय को याद कर सकू। 


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मेरे गुरु ने मुझे एक छोटा सा मंत्र दिया है जो में ध्यान करते समय हमेसा याद रखता हूँ। 


श्री रमन महर्षि का कहना है की हमेशा अपने अंदर एक सवाल पूछते रहो की "में कौन हूँ" ऐसा बार - बार करने पर तुम्हारे अंदर से ही इसका जवाब आएगा और तुम्हारे सारे प्रश्न पल भर में समाप्त हो जाएंगे। 


आज भारत में ऐसे गुरु - साधु बहुत ही कम बच्चे है और हे भी तो वो सभी के सामने अब नहीं आना चाहते है। अब में जल्द ही मेरे देश के लिए रवाना होने वाला हूँ।  मेने भारत में रहकर यहाँ की संस्कृति - विरासत और यहाँ के रीत - रिवाजों के बारे में जाना है में चाहता हूँ की अगले जन्म में, में भारत में ही पैदा होऊ। अब मेरे वापस मेरे देश जाने का समय आ गया है। 



नोट - ये कहानी हमने छोटे रूप में आपको बताई है अगर आपको और ज्यादा विस्तार से इस घटना के बारे में जानना है तो आप "गुप्त भारत की खोज" किताब खरीद कर पढ़ सकते हो बहुत ही प्यारी किताब है। 


"गुप्त भारत की खोज में आध्यात्मिक और रोमांचक यात्रा"


दोस्तों 20 सदी की यह सच्ची कहानी आपको कैसी लगी हमे जरूर बताएगा। वापस यूरोप जाकर पॉल ब्रन्टन ने बहुत सी किताबे लिखी उन्हीं किताबो में से एक है "गुप्त भारत की खोज" यह कहानी उसी किताब से ली गई है। धन्यवाद !!   

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