Teachers Day Speech in Hindi || एक गुरु जो अपने शिष्य को नारायण का अवतार मानते थे { Swami Vivekananda Story in Hindi }



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शिक्षक दिवस पर भाषण - Teachers Day Speech in Hindi 2020


Teachers Day शिक्षक दिवस - भारत में गुरु का स्थान सबसे ऊँचा है यहाँ पर गुरु को भगवान का रूप माना जाता है। कहते है की गुरु बिन ज्ञान नहीं। यहाँ पर गुरु के संबंध में बहुत सी किताबें भी लिखी जा चुकी है एवं गुरु पर कई सारी कविताएँ, कहानियाँ एवं दोहे और मंत्र भी है। जैसे - " गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः"


अर्थात - गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।


गुरु यानी शिक्षक की महिमा अपार है। उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, कवि, सन्त, मुनि आदि सब गुरु की अपार महिमा का बखान करते हैं। शास्त्रों में ‘गु’ का अर्थ ‘अंधकार या मूल अज्ञान’ और ‘रू’ का अर्थ ‘उसका निरोधक’ बताया गया है, जिसका अर्थ ‘अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला’ अर्थात अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का मार्ग दिखाने वाला ‘गुरु’ होता है। गुरु को भगवान से भी बढ़कर दर्जा दिया गया है। 


सन्त कबीर कहते हैं -

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय।।


अर्थात - गुरु और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए, गुरु को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है, जिनकी कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  


एक अध्यापक जो अपने शिष्य को नारायण का अवतार मानते थे


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Teachers Day Speech in Hindi 

भारत में गुरु को नारायण का अवतार माना जाता है। लेकिन आज हम आपको इस शिक्षक दिवस के अवसर पर एक ऐसी कहानी बताने जा रहे है जिसमे एक गुरु ने अपने शिष्य को नारायण माना और पुरे जीवन जिसका इंतजार किया था और जब वह शिष्य गुरु के सामने आया तो गुरु रो पड़े थे। 


हम बात कर रहे है विवेकानंद और श्री रामकृष्ण परमहंस की, यहाँ गुरु को इतनी ज्यादा प्रसिद्धी नहीं मिली जितनी ज्यादा शिष्य को मिली थी। आज रामकृष्ण परमहंस को पूरी दुनिया भले ही नहीं जानती होगी लेकिन विवेकानंद को अमेरिका से लेकर पूरा यूरोप, एशिया सब जानते है। 


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Happy Teachers Day in Hindi


स्वामी विवेकानंद एक सन्यासी थे। उन्होंने अपनी इच्छा से सन्यास ग्रहण किया था। विवेकानंद पुरे जीवन भर अविवाहित ही रहे थे। उनकी आत्मकथा में उन्होंने बताया था की जब मेरे पिता ने मेरी एक जन्म - कुंडली बनवाई थी तो उसे उन्होंने मुझे नहीं दिखाया था। काफी वर्षो बाद जब में घर गया तब मेरे पिता का देहावसान हो चूका था। उस समय घर में कई महत्वपूर्ण कागजात मुझे मिले उसमे मेरी जन्म - कुंडली भी थी। उसमे मेने देखा, यह भविष्यवाणी की गयी थी की यह इस धरती पर परिवारजक के रूप में जीवन बिताएगा। 


Swami Vivekananda Life Story in Hindi


बचपन से ही धर्म और दर्शन को जानने की मुझमें अपार ललक थी। स्वामी विवेकानंद आगे बताते है की जिस संप्रदाय से हूँ उसे संन्यासी संप्रदाय कहा जाता है। संन्यासी शब्द का अर्थ है - जिस व्यक्ति ने सम्यक रूप से त्याग किया हो। यह अति प्राचीन संप्रदाय है। ईसा के जन्म से 560 वर्ष पहले महात्मा बुद्ध भी इसी संप्रदाय में शामिल थे। पृथ्वी के प्राचीनतम ग्रंथ वेद में भी संन्यासीयो के बारे में काफी कुछ बताया गया है। 


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संन्यासी संप्रदाय का अर्थ चर्च नहीं है और न ही इस संप्रदाय पुरोहितों से है। स्वामी विवेकानंद कहना है की पुरोहित और सन्यासियो में जमीन - आसमान का फर्क है। स्वामी जी आगे कहते है की सन्यासियों के पास कोई जमीन - जायदाद या संपति नहीं होती है। संन्यासी लोग विवाह नहीं करते है। संन्यासी लोगो की कोई भी संस्था नहीं होती है। सन्यासियों का एक मात्र बंधन सिर्फ और सिर्फ उनके गुरुओं के साथ ही होता है। 


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Swami Vivekananda Story in Hindi

विवेकानंद का कहना है की गुरु पिता से भी बढ़कर है। उनका कहना है की पिता ने तो मुझे जन्म दिया है लेकिन गुरु ही है जो मुझे इस संसार में जीना सिखाते है और मुझे मुक्ति का रास्ता भी बताते है। इसलिए में पिता से भी पहले गुरु की पूजा करुँगा। हम संन्यासी आजीवन अपने गुरु से प्रेम करते है। कभी - कभी ऐसा भी होता है की गुरु तरुण अवस्था में हो और शिष्य वयोवृद्ध हो। 


स्वामी विवेकानंद की अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात Happy Teachers Day Short Speech and Story in hindi


स्वामी जी अपनी आत्मकथा में आगे बताते है की मेने एक वृद्ध पुरुष को अपने गुरु के रूप में पाया है। वे अद्धभुत थे। पांडित्य कहने जैसा उनमे कुछ भी नहीं था। उन्होंने पढ़ाई - लिखाई भी खास नहीं की थी। वह अलग - अलग संप्रदायो में जाते थे। कभी किसी में तो कभी किसी और में ऐसे धीरे - धीरे उन्होंने सभी पंथो और संप्रदायो से काफी अनुभव और ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इस प्रकार सभी साधनाओं के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचे की सभी धर्म - मत अच्छे है। वे किसी भी धर्म और मत की आलोचना नहीं करते थे।  वे कहा करते थे की " विभिन्न धर्म एक ही सत्य तक पहुँचने के अलग - अलग मार्ग है। उनका कहना था की इतने सारे पथ होना तो बहुत ही खुशी की बात है " क्योकि अगर ईश्वर को पाने का एक रास्ता होता तो वह सिर्फ किसी एक समुदाय या व्यक्ति के लिए ही उपयोगी होता। पथ की संख्या जितनी ज्यादा अधिक होगी उतना ही हमे सत्य को जानने का मौका प्राप्त होगा। "अगर कोई एक भाषा में नहीं जान पाया तो दूसरी भाषा में सीखने की कोशिश करेगा। सभी धर्म - मतों के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। 


Ram Krishna Paramhans Life Story in Hindi


में जब पहली बार उनसे मिला तब में भी हैरान और अचंभित रह गया था। उस समय रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता शहर के पास ही निवास करते थे और दूर - दूर से लोग उनके प्रवचनो को सुनने आते है। 


उस व्यक्ति के बारे में खबर सुन कर में भी उनके दर्शन करने पहुंच गया। लेकिन वे मुझे एक आम व्यक्ति जैसे ही लगे। उनमें मुझे कोई असाधारणता ढूँढे से भी नहीं दिखी। 


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में वहाँ पर मेरा गीत सुनाने भी गया था। जब मैने उस भीड़ में अपना गीत पूरा किया तब श्री रामकृष्ण अचानक उठे और मेरा हाथ पकड़ कर अपने कमरे के उतरी बरामदे में ले गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उन्होंने मेरा हाथ थामकर आँखो से धार - धार आँसू बहाते हुए जैसे हम पहले मिल चुके है इस तरह कहा " इतने दिनों बाद आना हुआ ? में कितनी अधीरता से तुम्हारी राह द्देख रहा था। यहाँ पर विषयी लोगों की बाते सुनते - सुनते मेरे कान पक गए है। किसी से जी खोल कर बाते भी नहीं कर पाता हूँ। उन्होंने इस प्रकार की मेरे साथ ढेर सारी बाते की थी और साथ - साथ रोते रहे थे। 


अगले ही पल वे मेरे सामने हाथ जोड़ कर कहने लगे " जानता हूँ, मेरे प्रभु तुम वही पुरातन ऋषि हो, तुम नर रूपी नारायण हो। जीवों की दुर्गति दूर करने के लिए तुमने दोबारा शरीर धारण किया है। 


विवेकानंद कहते है की में तो यह सब सुन कर अवाक् ! स्तंभित ! में मन ही मन सोचने लगा की में किस जगह आ गया हूँ। थोड़ी देर बाद वह अंदर गए और माखन मिश्री और मिठाईयाँ लेकर आए और मुझे प्यार से खिलाने लगे। 

 

तो इस प्रकार हुई थी मेरे गुरु से मेरी पहली मुलाकात और उस पहले दिन से ही वो मेरे दिलो - दिमाग में बस गए थे। आगे चलकर उन्होंने मुझे ध्यान, कर्म, ज्ञान, योग और मुक्ति के कई मार्ग बताए। आज मेरा जितना भी नाम है उसके पीछे मेरे ठाकुर (श्री रामकृष्ण परमहंस) का ही हाथ है। में हमेशा मेरे गुरु का ऋणी रहुँगा और केवल में ही नहीं बल्कि इस संसार में कोई भी शिष्य ऐसा नहीं है जो गुरु का ऋण चूका सके। 


तो दोस्तों यह थी आपके लिए शिक्षक दिवस पर एक प्रेणादायक कहानी जिसमें गुरु ने तो अपना धर्म निभाया ही साथ ही साथ उनके शिष्य ने भी अपना शिष्य धर्म बेखुभी से निभाया था। कृप्या इस जानकारी को अपने परिवार एवं दस्तों में जरूर शेयर करें। 


आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !! (Happy Teachers Day) 


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