Dadimaa Ki Kahaniyan - कहानी : अनपढ़ माँ का समझदार बेटा | Hindi Kahaniya for Kids | Moral Stories in Hindi



 Dadimaa Ki Kahaniyan - कहानी : अनपढ़ माँ का समझदार बेटा | Hindi Kahaniya for Kids | Moral Stories in Hindi - हिंदी कहानी


साँझ का समय था। सूरज छिपने ही वाला था। रमेश जल्दी - जल्दी कदम बढ़ा रहा था। आज उसे कुछ देर हो गई थी। उसने सोच लिया था की जब सारे फल बिक जाएंगे तभी घर जाऊंगा। अब गाता - गुनगुनाता खाली डंडिया हाथ में पकड़े हुए वह घर की और लोट रहा था। उसका घर थोड़ी ही दुरी पर था। जल्दी पहुंचने के लिए उसने पीछे वाला रास्ता जहाँ से रेलवे लाइन जाती थी वह पकड़ा था। 


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रमेश अपनी माँ का इकलौता बेटा था। बूढ़ी माँ की इच्छा थी की वह खूब पढ़े - लिखें, महान बने, पर यह संभव न हो सका घर की स्थिति कुछ ऐसी थी की रमेश की पढ़ाई बीच में ही रह गई थी। रात - दिन माँ बेटे रुपए कमाने के लिए बगीचे की रखवाली करते। हर चौथे - पांचवे दिन रमेश बाजार में जाकर फल बेच आता था। उसी से उनका घर चलता था। रमेश खूब मेहनती लड़का था। उसकी माँ ने उसे परिश्रम करना सिखाया था। 

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 Dadimaa Ki Kahaniya - कहानी : अनपढ़ माँ का समझदार बेटा


रमेश की माँ अनपढ़ अवश्य थी, पर वह थी बड़ी विचारशील और सुसंस्कारी। रुपए न होने के कारण वह रमेश को अब आगे नहीं पढ़ा पा रही थी, पर उन्होंने रमेश को अच्छे संस्कार दिए थे। 


माता - पिता अपने बच्चे को स्कुल भेज कर अपने कर्तव्य को पूरा हुआ समझ लेते है, पर मात्र स्कूलों की पढ़ाई से श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण नहीं हुआ करता है। उसके लिए तो अभिवावको को स्वम ही प्रयास करना पड़ता है। माँ की शिक्षा की वजह से रमेश छोटी आयु में ही बड़ा साहसी, वीर और सूझबूझ वाला बन गया था। माँ ने उसे दुसरो की सेवा एवं साहयता करना सिखाया था। 


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रमेश रास्ते में सोचता जा रहा था की आज उसकी माँ उससे बहुत खुश होएगी और घर जाकर खाना खा कर वह अपनी माँ से अच्छी - अच्छी कहानियाँ सुनेगा। तभी अचानक उसका ध्यान रेल की पटरियों की तरफ गया। सामने से तेज रेलगाड़ी चली आ रही थी, पर एक बूढ़ी दादी माँ इससे बेखबर लाइन के बीचो - बीच शान से चल रही थी। रमेश ने जोर - जोर से आवाज लगाई - दादी माँ.......दादी माँ......... ! जल्दी हटो वहाँ से रेल गाड़ी आ रही है। 


पर कानो से बहरी उस बूढ़ी औरत को न कुछ सुनता और न ही सही से कुछ दिखाई देता था। इस लिए वह इस बात से बेखबर अपनी ही धुन में पटरियों पर आगे बढ़ी चली जा रही थी। गाड़ी अब निकट आ रही थी। रमेश ने देखा बूढी दादी सुनने वाली नहीं, तो वह तेजी से भागा और उसे धक्का दे दिया। वह पटरी से कुछ ही दुरी पर जा पड़ी लेकिन तब तक गाड़ी वहाँ आ पहुंची थी। 


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उस रेलगाड़ी की इंजन से कोयला गिरा और रमेश का हाथ उस से जल गया था। तब तक बुढ़िया माई भी सीधी हो कर बैठ चुकी थी। उसकी समझ में भी अब यह बात आ चुकी थी की उसे धक्का क्यों दिया गया था। वह अपने प्राण बचाने वाले उस बालक की तरफ तेजी से पहुंची। बूढी अम्मा रमेश के जख्म देख कर घभरा गई थी और आस - पास जाते हुए कुछ राहगीरों को तुरंत बुला लाई। राहगीर उसे अस्पताल ले आए। 


डॉक्टर ने रमेश की मरहम पट्टी की, उसे ग्लूकोज चढ़ाया गया। डॉक्टर ने रमेश से पूछा --- "बेटे ! तुम इतना कैसे जल गए ?"


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रमेश ने डॉक्टर को पूरी घटना बताई। उसे सुनकर डॉक्टर भी गदगद हो उठा। छोटे बालक के साहस के आगे डॉक्टर का मस्तक भी श्रद्धा से झुक गया था। बूढी दादी की आँखों में आँसु भर आए थे। वह रमेश के सिर पर हाथ फेरती हुई बोली -" बेटा ! मुझ बुढ़िया को मर जाने देता। क्यों तूने मेरे लिए अपनी जान खतरे में डाली ?"


रमेश बोला - "तुम मेरी दादी माँ के समान हो। भला फिर तुम्हे कैसे मरने देता। तुम्हे बचाना तो मेरा कर्तव्य है। 


दादी माँ ने कहा - ईश्वर सदैव तुम्हे ऐसी ही शक्ति दे। 


डॉक्टर ने भी रमेश की पीठ थपथपाते हुए कहा - तुम बहुत बहदुर हो तुम्हारी माता - पिता ने तुम्हे बहुत अच्छे संस्कार दिए है। में तुम्हे आगे की पढ़ाई करवाऊंगा। ऐसा सुनकर रमेश बहुत खुश हुआ और घर आ कर पूरी घटना अपनी माँ को बताई। 


रमेश की माँ भी यह सब सुनकर काफी खुश थी और अब रमेश आगे पढ़ाई भी करेगा ऐसा सुनकर तो माँ की आँखों में आँसु आ गए। माँ को रोता देख रमेश ने कहा माँ अब चिंता मत करो में जल्द ही पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनुगा और आपके सारे दुःखो को समाप्त कर दूँगा। 


इस कहानी से शिक्षा Moral Stories in Hindi


बच्चों इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए और अपने माता - पिता का हमेशा आदर करना चाहिए। चाहे घर की किसी भी परिस्थति हो हमें अपने संस्कारों को हमेसा याद रखना चाहिए। 


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