Rishi muni kya khate the - जानिए हमारे ऋषि-मुनियों की लंबी उम्र और सेहत का क्या था राज - Body Kaise Banaye Tips Hindi



Body Bnane Ke Liye Kya Khaye, Sehat Kaise Banaye Kya Khaye - Rishi muni kya khate the - जानिए हमारे ऋषि-मुनियों की लंबी उम्र और सेहत का क्या था राज - Secret to a Long and Healthy Life - Sarir Banane Ke Upay Hindi Me


प्राचीन समय में हमारे पूर्वज एवं भारतीय ऋषि-मुनि बहुत ही शानदार जीवन जीते थे। आज के समय में इतनी ज्यादा बीमारियों का कारण केवल और केलव हमारा भोजन है। अब युवा भी धीरे - धीरे मानसिक तनावों और बहुत सारी चिंताओं के कारण शरीर से कमजोर होता जा रहा है। 


हमारी सेहत को हमारे खान - पान से इसलिए भी जोड़कर देखा जाता है क्योकि शरीर को सुचारु ढंग से चलाने के लिए इसे स्वस्थ भोजन की बहुत ही ज्यादा आवश्यकता है। नेटवर्किंग की इस दुनिया में न तो मानव अपने परिवार के लिए समय निकाल पा रहा है और न ही अपने खुद के लिए। ऐसे में अब बदलती जीवन शैली के कारण मोटापा, आँखों से कम दिखना, कम सुनाई देना, सरदर्द, पेटदर्द कमर में मोच ,घुटनो में दर्द आदि समस्या तो आपको हर घर में देखने को मिल जाएगी। लेकिन आज से 500 एवं 1000 साल पहले ऐसा नहीं था। उस समय मानव बहुत ही खुश था उसके पास सभी साधन थे अच्छा भोजन था और एक अच्छी लाइफ थी। 


Secret to a Long and Healthy Life in Hindi

बात करे अगर वैदिक काल की तो वैदिक काल में तो मनुष्य काफी सालो तक अपना जीवन जीते थे और अंत में अपनी मर्जी से शरीर त्यागते थे न की किसी बीमारी के कारण।  ऐसा इसलिए क्योकि उनका भोजन हमारे भोजन से काफी अलग था। जब - जब इस  धरती पर भयंकर युद्ध हुए है तब - तब इंसानी भोजन में बदलाव हुआ है और धीरे - धीरे हम एकदम नीचे के स्तर तक पहुंच गए है। 


वैज्ञानिको के एक सर्व के अनुसार अगर अब एक और युद्ध हुआ यानी तृतीय विश्व युद्ध हुआ तो हम सब समुन्द्र में मौजूद सेवाल और मशरूम ही खा पाएंगे। क्योकि इस युद्ध के बाद धरती पर अन्य कोई धान की खेती नहीं होगी और पानी में मौजूद कुछ चुनिंदा सेवालो से ही इंसान अपना पेट भरेंगे। 

ऐसे में उस भोजन से हमारा जीवन और छोटा हो जायेगा। यानी 80 वर्ष से सीधे 40 वर्ष तक ही। ऐसे में युद्ध कभी भी नहीं होना चाहिए। 


आइये जानते है हमारे ऋषि - मुनियो की लंबी उम्र का क्या राज था वह भोजन में आखिर क्या खाते थे -  


कंद - पौधे के कंद को सब्जी के रूप में सेवन किया जाता था। कंद का अधिकतर उपयोग बवासीर, स्वास रोग, खाँसी, आमवात और कृमिरोगों आदि में आज भी होता है। लेकिन आज बहुत से लोग कंद के बारे में जानते तक नहीं है की आखिर पौधे का कंद क्या होता है। जिमीकन्द, सूरनकंद ऐसी बहुत सी सब्जियाँ आज भी कई गावो में बनती है। सूरनकंद एक मजबूत, बड़े आकार का कंद होता है जिसमें मुख्य रूप से प्रोटीन, वसा, कार्बोहाईड्रेड्स, क्षार, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह तत्व और विटामिन ए व बी पाए जाते हैं।


सूरनकंद की सब्जी बनाकर सेवन करने से यकृत से जुड़ी तमाम समस्याओं में फायदा होता है। आंव अथवा दस्त लगातार होने की दशा में कंद को सुखाकर, चूर्ण बनाकर इसे घी में सेका जाता है और फिर रोगी को इसमें थोड़ी शक्कर ड़ालकर दिया जाता है। आदिवासियों के अनुसार यह दस्त रोकने का अचूक उपाय है। सूरनकंद की सब्जी कमजोरी, दुर्बलता और वीर्य को कमी को भी दूर करती है। इसके सेवन से वातरोग में भी फायदा होता है। सूरनकंद को पानी में पीसकर लेपन करने से जोड़ दर्द और आमवात में आराम मिलता है। शकरकंद भी एक प्रकार से कंद ही है। शकरकंद में भरपूर मात्रा में विटामिन बी6 पाया जाता है, जो शरीर में होमोसिस्टीन नाम के अमीनो एसिड के स्तर को कम करने में सहायक होता है


मूल- हमारे ऋषि मुनि पहले जमीन में अंदर उगने वाली सब्जियाँ एवं कई गुणकारी पौधो की जड़ो की सब्जियाँ बना कर खाते थे। जिसके बारे में अब हमारे पास जानकारी बहुत कम बची है। वर्तमान में मौजूदा - आलू , गाजर, मूली भी एक प्रकार से जड़े ही है जो बहुत गुणकारी है। इनसे बॉडी को जरुरी न्यूट्रिएंट्स मिलते थे और बीमारियों से बचाव होता था।


फल- हमारे ऋषि मुनि प्रांत काल रोज ताजे फल खाते थे। ताजे फलों से उनके शरीर को एनर्जी और न्यूट्रिएंट्स के अलावा फाइबर्स भी मिलते थे।


आंवला- आंवला का तो आयुर्वेद में बहुत अधिक महत्व भी बताया गया है। आंवले के रोज सेवन से त्वचा में निखार रहता है बाल सफेद नहीं होते है। आंवले के उपयोग से पाचन शक्ति भी बढ़ती है। ये ऋषि-मुनियों की डाइट में फ़ूड और मेडिसिन दोनों के रूप में शामिल था। 


शहद- इसमें एंटीबायोटिक और एंटीबैक्टीरियल के रूप में बीमारियों से बचाव करने की काफी शक्ति होती है। ऋषि-मुनि जंगल में रहते थे और वहां पर शहद उनकी डाइट का अहम हिस्सा था। शहद का उपयोग वो धार्मिक कार्यो में भी काफी किया करते थे। दिल से जुडी बीमारियों एवं अस्थमा रोगियों के लिए भी शहद एक वरदान है। शहद के कारण शरीर में ऊर्जा बनती है जो हमारे शहरी में मौजूदा वायरस को खत्म करने में भी साहयक है।  


दूध- प्राचीन ऋषि-मुनियों के आश्रम में बहुत से राजा - महाराजाओं के बच्चे उनके शिष्य के रूप में शिक्षा का अध्यन करते थे। ऐसे में उन ऋषि - महात्माओं के आश्रम में बहुत सी गाय भी होती थी। ऐसे में वह स्वम भी गाय का ताजा दूध पीते थे और अपने आश्रम के बच्चों को भी सुबह - शाम दूध एवं हफ्ते में एक बार दूध से बनी मिठाइयाँ एवं खीर का भी सेवन करते थे। ऐसे में दूध पीने से उनकी हड्डियां मजबूरत रहती थी और चेहरे पर निखार भी रहता था और बहुत सी बीमारियों से बचाव होता था।


घी- आश्रम में इतनी सारी गाय होने के कारण वह दूध, दही, मखन, छाछ के साथ - साथ गाय का शुद्ध देशी घी भी खाते थे। वह आटे गूंथने में पानी की जगह घी ही यूज करते थे। जैसा की राजस्थान के कुछ राजा - महाराजा भी ऐसा अपने स्वादिष्ट और बलशाली भोजन के लिए किया करते थे। ताजा घी से खून बढ़ता है शरीर में एनर्जी भी मिलती है और शरीर का बल भी बढ़ता है। ताजा घी के सेवन से उनकी चमड़ी में जल्दी झुर्रियां नहीं पड़ती थी और उनकी त्वचा भी ग्लोइंग रहती थी। 


दही- ऋषि-मुनि अपने भोजन में दही जरूर शामिल करते थे। इससे डाइजेशन अच्छा होता था और पेट की बीमारियों से बचाव होता था। वैज्ञानिको की एक रिपोट में अभी हाल ही में यह खुलासा भी हुआ है की दही खाने वाले व्यक्ति कम तनाव में रहते है और उन्हें दिमाग से जुडी बीमारियाँ नहीं होती है। दही खाने से नींद न आने की समस्या भी दूर हो जाती है। हलाकि सर्दियों में दही, छाछ का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे कफ बनने की शिकायत हो सकती है। दही, छाछ में खटाई की मात्रा होती है इसलिए अगर आपके पैरो में कमर में हाथो में दर्द रहता है तो आपको दही का सेवन नहीं करना चाहिए इसके आलावा आप छाछ से बनने वाली कढ़ी का सेवन कर सकते हो। 


सब्ज़ियां- ऋषि-मुनि बहुत से प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जियाँ भी खाते थे साथ ही साथ वह दिन भर के भोजन में सलाद का उपयोग भी करते थे। सब्जियों में पालक, सरसों, हरी मिर्च, मेथी, सोयाबीन एवं कई अन्य प्रकार की सब्जियाँ की जानकारी भी उन्हें थी जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद होती है। इससे उन्हें जरुरी मल्टी विटामिन्स और मिनरल्स के साथ फाइबर्स भी मिलते थे।


साबुत अनाज- स्वस्थ रहने के लिए ऋषि मुनि गेहू, बाजरा, बेसन, मेदा न के बराबर ही खाते थे। ऐसे में वह पका हुआ भोजन कम करते थे। फल - सब्जियों के आलावा वह साबुत दानाअनाज ज्यादा खाया करते थे।  इसमें मौजूद न्यूट्रिएंट्स से दिल की बीमारियों से बचाव होता है। वह गेहू से ज्यादा जौ का उपयोग करते थे। अभी हाल ही में सिंधु घाटी की खुदाई में भी यह बात साफ हो चुकी है की हड़प्पा सभ्यता के लोग जौ की खेती करते थे और धार्मिक कार्यो में भी जौ का उपयोग करते थे। 


चना- प्राचीन समय के ऋषि - मुनि हरे चने की सब्जियाँ काफी खाया करते थे साथ ही साथ भुने हुए चने भी वह अपने साथ हमेशा रखते थे ऐसे में अगर उन्हें किसी लम्बी यात्रा पर जाना होता तो वह अपने साथ चने हमेशा रखते थे जिन्हें भिगों कर भी सुबह - सुबह खाया जाता है जो हमारे शरीर के लिए काफी हेल्दी है।  


इन सभी के आलाव वह और भी कई प्रकार की चीजों को अपने भोजन में शामिल करते थे। प्राचीन ऋषि - मुनि हर चीज को बहुत ही कम मात्रा में खाया करते थे उनका कहना था की अगर हम किसी भी चीज को एकदम कम मात्रा में ले तो वह हमारे शरीर के लिए औषदि के रूप में काम करेगी और अगर हम उसी चीज में अति कर दे यानी की उसकी मात्रा बहुत अधिक बढ़ा दे तो वही कीमती भोजन हमारे लिए जहर भी बन सकता है। 


इसलिए प्राचीन ऋषि - मुनि इमली, आवला, दही, छाछ, नीम्बू, संतरा इतनी ज्यादा खटाई की सामग्री लेने से भी स्वस्थ रहते थे क्योकि वह इन सब की मात्रा  थोड़ी - थोड़ी ही लेते थे। जिससे वही चीजे उनके लिए औषधि का काम करती थी। 

No comments:

Post a Comment