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99 Ka Fer - कहानी : 99 का फेर - आचार्य ओशो रजनीश की कहानी | Osho Story Hindi | Inspirational Spiritual Stories in Hindi - आध्यात्मिक कहानियां



एक सम्राट का एक नाई था। वह उसकी मालिश करता, हजामत बनाता। सम्राट बड़ा हैरान होता था कि वह हमेशा प्रसन्न, बड़ा आनंदित, बड़ा मस्त रहता था ! उसको एक रुपया रोज मिलता था। बस, एक रुपया रोज में वह खूब खाता-पीता, मित्रों को भी खिलाता-पिलाता। सस्ते जमाने की बात थी। 


रात जब सोता तो उसके पास एक पैसा न होता, वह निश्चिन्त सोता था । सुबह एक रुपया फिर उसे मिल जाता मालिश करके। वह बड़ा खुश था ! इतना खुश था कि सम्राट को उससे ईर्ष्या होने लगी। सम्राट भी इतना खुश नहीं था। खुशी कहां उदासी और चिंताओं के बोझ और पहाड़ उसके सिर पर थे। 


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एक दिन सम्राट ने नाई से पूछा कि तेरी प्रसन्नता का राज क्या है? उसने कहा, मैं तो कुछ जानता नहीं, मैं कोई बड़ा बुद्धिमान नहीं। लेकिन, जैसे आप मुझे प्रसन्न देख कर चकित होते हो, मैं आपको देख कर चकित होता हूं कि आपके दुखी होने का कारण क्या है? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और मैं सुखी हूँ; आपके पास सब है और फिर भी आप सुखी नहीं है ! आप मुझे ज्यादा हैरानी में डाल देते हैं।


मैं तो प्रसन्न हूँ, क्योंकि मेरा प्रसन्न होना स्वाभाविक है और होने को है ही क्या? सम्राट उसे देख कर मन ही मन सोचने लगे की इससे तो बेहतर नाई ही होते। यह सम्राट हो कर क्यों फंस गए? न रात नींद आती, न दिन चैन है; और रोज चिंताएं बढ़ती ही चली जाती हैं। एक समस्या हल करो, दस खड़ी हो जाती हैं। तो नाई ही हो जाते। 


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अपनी समस्या सम्राट ने अपने वजीर को सुनाई और वजीर ने कहा, आप घबड़ाएं मत। मैं उस नाई को दुरुस्त किए देता हूँ। वजीर तो गणित में कुशल था। सम्राट ने कहा, क्या करोगे? उसने कहा, कुछ नहीं। आप एक - दो दिन में देखना। वजीर 99 रुपये को एक थैली में रख कर रात नाई के घर में फेंक आया।


जब सुबह नाई उठा, तो उसने 99 गिने, बस वह चिंतित हो गया। उसने कहा, बस एक रुपया आज मिल जाए तो आज उपवास ही रखेंगे, 100 रूपये पूरे कर लेंगे ! बस, उपद्रव शुरू हो गया। कभी उसने इकट्ठा करने का सोचा न था, इकट्ठा करने की सुविधा भी न थी। एक रुपया मिलता था, वह पर्याप्त था जरूरतों के लिए। कल की उसने कभी चिंताकी ही न थी। 


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‘कल’ उसके मन में कभी छाया ही न डालता था; वह आज में ही जीया करता था। आज पहली दफा ‘कल’ उठा।  99 पास में थे, 100 करने में देर ही क्या थी! सिर्फ एक दिन तकलीफ उठानी थी कि100 हो जाएंगे। उसने दूसरे दिन उपवास कर दिया। लेकिन, जब दूसरे दिन वह आया सम्राट के पैर दबाने, तो वह मस्ती न थी, उदास था, चिंता में पड़ा था, अंदर ही अंदर कोई गणित चल रहा था। सम्राट ने पूछा, आज बड़े चिंतित मालूम होते हो? मामला क्या है? उसने कहा: नहीं हजूर, कुछ भी नहीं, कुछ नहीं सब ठीक है। 


मगर आज बात में वह सुगंध न थी जो सदा होती थी। ‘सब ठीक है’ ऐसे कह रहा था जैसे सभी कहते हैं, सब ठीक है। जब पहले कहता था तो सब ठीक था ही। आज औपचारिक कह रहा था। सम्राट ने कहा, नहीं मैं न मानूंगा। तुम उदास दिखते हो, तुम्हारी आंख में रौनक नहीं। तुम रात सोए ठीक से नहीं? उसने कहा, अब आप पूछते हैं तो आपसे झूठ कैसे बोलूं ! रात में सो नहीं पाया। लेकिन सब ठीक हो जाएगा, एक दिन की बात है। आप घबड़ाएं मत। लेकिन वह चिंता उसकी रोज बढ़ती गई। 


सौ पूरे हो गए, तो वह सोचने लगा कि अब 100 तो हो ही गए; अब धीरे-धीरे इकट्ठा कर लें, तो कभी दो सौ हो जाएंगे। अब एक-एक कदम उठने लगा। वह पंद्रह दिन में बिलकुल ही ढीला-ढाला हो गया, उसकी सब खुशी चली गई। सम्राट ने कहा, अब तू बता ही दे सच-सच, मामला क्या है? मेरे वजीर ने कुछ किया? तब वह चौंका। नाई बोला, क्या मतलब? आपका वजीर? अच्छा, तो अब मैं समझा। अचानक मेरे घर में एक थैली पड़ी मिली मुझे – निन्यानबे रुपए। बस, उसी दिन से मैं मुश्किल में पड़ गया हूं।  


हम सभी भी ऐसे ही 99 के फेरे में अटके हुए है और 100 पूरा करने के चक्कर में वर्तमान जीना ही भूल जाते है और भविष्य की चिंताओं से घिरे रहते है की कब 100 पुरे होंगे और कब हमारा सपना पूरा होगा। लेकिन हमें 100 के फेरे में न पड़कर प्रतिदिन अपने भरपूर जीवन का आनंद लेना चहिए। चिंता न करे जब 100 पुरे होने होंगे हो जाएंगे। प्रतीक्षा न करें। जीना शुरू करे। 



-  आचार्य रजनीश 


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