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सिंधु घाटी सभ्यता (3300 - 1300) हड़प्पा सभ्यता का इतिहास - Sindhu Ghati Sabhyata (Harappa Sabhyata) in Hindi - Indus Valley Civilisation Hindi



सिंधु घाटी सभ्यता (3300 - 1300) हड़प्पा सभ्यता का इतिहास - Sindhu Ghati Sabhyata in Hindi - Indus Valley Civilisation, Ancient History of India - Harappa Sabhyata in Hindi Notes



परिचय


सिंधु घाटी सभ्यता दक्षिण एशिया के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में स्थित एक कांस्य युगीन सभ्यता थी। प्राचीन मिस्त्र एवं मेसोपोटामिया को सम्मिलित करते हुए यह विश्व की तीन प्राचीनतम सभयताओं में से एक थी। दयाराम साहनी के निर्देशन में 1921 में हडप्पा नामक स्थल पर पहली बार उत्खन्न कार्य प्रांरभ किया गया था, अत: इसे हडप्पा सभ्यता भी कहा जाता है।


इस सभ्यता का विस्तार पश्चिम दिशा में बलुचिस्तान के सुत्कागेन्डोर, पूर्व में आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश), दक्षिण में दायमाबाद (महाराष्ट्र) एवं उत्तर में मंदा (जम्मू कश्मीर) तक फैला हुआ है।


1. हडप्‍पा


1. यहाँ पर छ: अन्नागार एवं छ: अग्निकुंड प्राप्त हुए है।


2. यहाँ वृत्तनुमा ईटों से बने पंक्तिदार फर्श प्राप्त हुए है जो संभ्वत: खाद्यान्न के गहन के काम आते थे।


3. हडप्पा के लोग टारकोल (डामर) बनाने की विधि से अवगत थे।


4. गृह में प्रवेश के मुख्य द्वारा उत्तर दिशा में होते थे।


5. यहाँ पर R – 37 कब्रिस्तान प्राप्त हुआ है।


6. यहाँ पर माँ देवी की मिट्टी की मूर्ति प्राप्त हुई है।


2. मोहनजोदडो


1. मोहनजोदडो की खोज राखल दास बनर्जी द्वारा 1922 में की गई थी।


2. सिंधी भाषा में मोहनजोदडो का शाब्दिक अर्थ मृतको के टीले है।


3. यह सिंध (पाकिस्तान) के लरकाना जिले में सिंधु नदी के पश्चिम में एवं सिंधु नदी एंव घग्गर हाकडा नदी के मध्य में स्थित है।


4. सिंधु नदी वर्तमान में भी इस स्थल के पूर्व में बहती है, परन्तु घग्गर – हाकड़ा नदी सूख चुकी है।


5. यहाँ पर एक विशाल स्नानागार, एक विशाल अन्नागार, बडे हॉल, एक कांसे की नृतकी की मूर्ति, योगी की मोहर, एक 250 ग्राम वजनी गले का हार एवं कई अन्य मोहरें प्राप्त हुई है।


6. एक सभागार, रसोई व आँगन के साथ सुव्यवस्थित घरों के साक्ष्य भी प्राप्त हुए है।


7. मोहनजोदड़ो शहर की सात परतें इंगित करती है कि शहर को सात बार नष्ट किया गया एवं पुन: निर्माण किया गया था।


3. चनहुदड़ो


1. चन्हुदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता के नगरीय झुकर चरण से सम्बंधित एक पुरातत्व स्थल है।


2. यह क्षेत्र पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के मोहेंजोदड़ो से 130 किलोमीटर (81 मील) दक्षिण में स्थित है।


3. इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में 'एन.गोपाल मजूमदार' ने किया तथा 1943 ई. में 'मैके' द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। सबसे निचले स्तर से सैंधव संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं।


4. यहाँ पर मनके का कारखाना मिला है यानी जो भी आभूषण से संबंधित समान है वह यहाँ मनाए जाते थे। 


5. यहाँ पर बिल्ली और कुत्तो के पंजो के निशान भी मिले है। 


6. यहाँ पर वक्राकार ईंटे और लिपस्टिक, कंघा, उस्तरा, काजल आदि समान भी मिले है। 


7. ये लोग मिटी की पकी हुई पाइपनुमा नलियों का प्रयोग भी करते थे। 


8. सिंधु नदी के बाई तरफ मोहनजोदड़ो था तो दाई तरफ चनहुदड़ो नगर था।  


4. लोथल


1. इसकी खोज एस.आर.राव द्वारा 1954 में वर्तमान गुजरात के भाल क्षेत्र में कि गई थी।


2. यहाँ से लाल – काले मिट्टी के बर्तन, तांबे के औजार, ईंटो द्वारा निर्मित टैंक की संरचना, एक मोती बनाने का कारखाना एवं ईरान की मोहर प्रात्त हुई है।


3. यहाँ से आटा पीसने की पत्थर की चक्की भी प्राप्त हुई है। 


5. कालीबंगा


1. कालीबंगा की खोज एक इतालवी भारत विद् लुईगी पियो तेस्सीटोरी द्वारा सन 1953 में राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में की गई थी।


2. यह मोहनजोदड़ो की तरह सुव्यवस्थित नहीं थी।


3. यहाँ जल निकासी व्यवस्था नहीं थी, परंतु कुछ अग्निकुंड एवं एक जुते हुए खेत के साक्ष्य प्राप्त हुए है।


4. यहाँ पर भूकंप के प्रमाण भी मिले है। 


6. बनावली


1. बनावली एक भारतीय राज्य हरियाणा के हिसार जिला स्थित एक पुरातत्व स्थल है जो कि सिन्धु घाटी सभ्यता से सम्बन्धित है।


2. यहाँ से मिटी का बना हल प्राप्त हुआ है। 


3. उत्तम किस्म का जौ भी बनावली से प्राप्त हुआ है। 


4. यहाँ पर मंदिर होने की बात भी कही जा रही है। 


5.  इसकी खोज 1974 में रबिन्द्र सिंह बिष्ट ने की। इस स्थान से हल के खिलौने के साक्ष्य भी मिले है। 


7. धोलावीरा


1. धोलावीरा की खोज 1922 में जे.पी. जोशी द्वारा गुजरात के कच्छ जिले में की गई थी।


2. धोलावीरा में एक दरवाजे पर बडे अक्षरों में लिख गया लेख प्राप्त हुआ है।


3. रॉक कट वास्तुकला एवं आधुनिक जल प्रबंधन व्यवस्था के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।


सिंधु घाटी सभ्‍यता की प्रमुख विशेषताएँ


1. नगर नियोजन हडप्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता थी। अत: यह सभ्यता प्रथम शहरीकृत सभ्यता भी कहलाती है।


2. कस्बे दो भागों में विभक्त थे, यथा दुर्ग एवं निचला कस्बा। दुर्ग में शासन प्रबंध करने वाले सदस्य रहते थे जबकि कस्बे का निचला भाग जन साधारण के लिए था।


3. धोलावीरा इसका एकमात्र अपवाद है क्योंकि यह तीन भागों में विभक्त था।


4. कस्बे की मुख्य विशेषता उनकी जल निकासी व्यवस्था थी। नालियाँ पकी हुई ईंटों की बनी हुई थी एवं बड़े पत्थरों से ढकी हुई थी। सफाई के लिए मेनहोल्स थे। इससे ज्ञात होता है कि हडप्पा के लोग सफाई का विशेष तौर पर ध्यान रखते थे।


5. इस सभ्यता के लोग नापतौल की ईकाईयों से परिचित थे क्योंकि यहाँ से कुछ लकड़ी के टुकडे प्राप्त हुए जिन पर माप – तौल की ईकाईयाँ अंकित थी।


6. मृत्यु के बाद शव को दफनाया जाता था।


7. बनवाली एवं कालीबंगा दो चरणों को दर्शाती है, पूर्व हडप्पा सभ्यता एवं हडप्पा सभ्यता।


8. बिना दुर्ग के एकमात्र शहर चन्हुदडो था।


हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था 


1. कृषि एवं पशुपालन


1. यहाँ के लोग गेहुँ एवं जौ की वृहत पैमाने पर कृषि करते थे। कुछ अन्य फसलें जो इस समय उगाई जाती थी, वे है – दालें, अनाज, कपास, खजूर, मटर, तरबूज एवं सरसों।


2. चावल की खेती के स्पष्ट साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए है। केवल रंगपुर एवं लोथल से चावल के कुछ दाने प्राप्त हुए हैं, परन्तु संभवत: वह बाद की अवधि के हैं।


3. हडप्पा के लोग अधिकतर किसान थे, अत: यह कहा जा सकता है कि हडप्पा सभ्यता एक कृषि वाणिज्यिक सभ्यता थी।


4. कालीबंगा एवं बनवाली से हल एवं कुदाल के साक्ष्य प्राप्त हुए है।


5. हडप्पा सभ्यता के लोग भेड, बकरी, भैंस एवं सुवर पालते थे। वे बाघ, ऊँट, हाथी, कछुआ, हिरण आदि के बारे में जानते थे, परन्तु वे शेर के बारे में नहीं जानते थे।


6. गैंडा सबसे प्रमुख पशु था, यहाँ के लोग घोड़े के बारे में नहीं जानते थे।


7. हडप्पा के लोग कपास उत्पादन करने वाले पहले लोग होंगे क्योकि यहाँ पर कपास के सर्वप्रथम उत्पादन के साक्ष्य प्राप्त हुए है।


8. युनानी इसे सिंदो कहते थे, जो कि सिंद शब्द से प्रेरित है।


9. हाल ही में यहाँ खुदाई के दौरान सुरकोटदा (गुजरात) में घोड़े की अस्थियाँ मिली है और पाकिस्तान में एक स्थान पर घोड़े के दाँत भी मिले है। इससे यह जाहिर होता है की इन लोगो को घोड़ों के बारे में भी पता था। 


2. शिल्‍पकला


1. हडप्पा सभ्यता कांस्य युग के अन्तर्गत आती है क्योंकि यहाँ के लोग कांस्य के निर्माण एवं उपभोग से परिचित थे।


2. यहाँ के लोग चित्र, बर्तन, विभिन्न औजार एवं शस्त्रों का निर्माण करते थे कुल्हाडी, चाकू, आरी, भाले आदि।


3. बुनकर ऊन एवं कपास के कपडे बुनते थे। यहाँ के लोग चमड़े के बारे में भी जानते थे परन्तु यहाँ से रेशम के कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए।


4. हडप्पा के लोग मोहरें, पत्थर की मूर्तियाँ, टेरा कोटा की मूर्तियाँ आदि बनाते थे।


5. मिट्टी एवं पक्की ईंटो के विशाल ढाँचों को देखकर लगता है कि ईटो के व्यापार का हडप्पाई अर्थव्यवस्था में महत्वपुर्ण स्थान था।


6. यहाँ के लोग लोहे के बारे में नहीं जानते थे।


7. यहाँ की मुहरों से यह ज्ञात होतो है कि यहाँ के लोगों को नाव बनाना भी आता था।


3. मुहरें


1. इनका मुख्य कलात्मक कार्य मुहरों का निर्माण करना था।


2. मुहरें सेलखेडी (साबुन – पत्थर) की बनी होती थी एवं यह आकृति में वर्गाकार होती थी।


3. सर्वाधिक वर्णित पशु सांड है। भेड, हाथी, बाघ, गैंडा इनका भी वर्णन मिलता है परन्तु गाय, शेर एवं घोडे का वर्णन नहीं है।


4. हडप्पा स्थलों से लगभग 200 मुहरे प्राप्त हुई है।


5. स्वर्णकार स्वर्ण, चाँदी एवं मूल्यवान पत्थरों के आभूषण बनाते थे।


6. चुडियाँ बनाने एवं खोल आभूषण का कार्य भी किया जाता था जिसका ज्ञान चन्हुदडो, लोथल एवं बालाकोट के जाँच – परिणामों से होता है।


4. व्‍यापार


1. भूमि व्यापार एवं समुद्री व्यापार प्रचलन में था।


2. लोथल में एक बड़ा पोतगाह (जहाज बनाने का स्थान) मिला है जो कि संभवत: हडप्पा सभ्यता की सबसे लंबी इमारत है।


3. सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक सम्बंध मेसोपोटामिया के साथ थे। अन्य देश, जिनके साथ व्यापार होता था। वे थे अफगानिस्तान, पर्शिया, मध्य एशिया एवं भारत के विभिन्न भाग।


4. मेसोपोटामियन शिलालेखों में मेलूहा के साथ व्यापारिक संबधों का वर्णन है जो कि सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम माना जाता है।


5. दो मध्यवर्त्ती व्यापारिक केन्द्र यथा दिलमन एवं मकन को क्रमश: बहरीन एवं मकरन तट (पाकिस्तान) के नाम से जाना गया है।


6. व्यापार की व्यवस्था वस्तु विनिमय प्रणाली थी।


5. हडप्‍पा सभ्‍यता के धर्म


1. मोहन जोदडो से पशुपति की मुहर प्राप्त हुई है, जिस पर योगी का चित्र अंकित है।


2. मुहर पर योगी का चित्र चारों ओर से भैंस, बाघ, हाथी, गैंडा एवं हिरण से घिरा हुआ है। अत: योगी को आदि – शिव कहा गया है।


3. लिंगोपासना के चिह्न भी प्राप्त हुए है।


4. हडप्पा के लोग माँ देवी की पूजा करते थे। यह हडप्पा से प्राप्त हुई मिट्टी की मूर्ति से ज्ञात होता है।


5. एक विशालकाय इमारत जिसे महान स्नान कहा गया है, मोहन जोदडो से प्राप्त हुई है। यह धार्मिक स्नान या धार्मिक क्रियाकलापों के लिए काम में लिया जाता है।


6. यहाँ के लोग अंधविश्वासी थे एवं ताबीज पहनते थे।


7. हडप्पा सभ्यता के लोग पीपल के पेड़ की पूजा करते थे।


8. इस सभ्यता से मंदिरो के कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए है।


6. हडप्‍पा सभ्‍यता की लिपि


1. हड़प्पा सभ्यता के लोग लेखन कला को जानते थे।


2. हडप्पा सभ्यता के लेखों के पत्थरों की मुहरों एवं अन्य वस्तुओं पर लगभग 4000 लेख प्राप्त हुए हैं।


3. हडप्पा की लिपि वर्णों (शब्दों) पर आधारित न होकर चित्रों पर आधारित है।


4. अभी तक हडप्पा लिपि पढी नहीं जा सकी है।


5. लिपि में 400 चिह्न है, जिनमें से 75 मूल है एवं शेष उन्ही के प्रकार है।


राखीगढ़ी


राखीगढ़ी निकला देश की सबसे पुरानी मानव सभ्यता का शहर


हाल ही में राखीगढ़ी में हुई खोजो ने फिर से इतिहास को बदल दिया है। राखीगढ़ी सिन्धु घाटी सभ्यता का भारतीय क्षेत्रों में धोलावीरा के बाद दूसरा विशालतम ऐतिहासिक नगर है। इसकी प्रमुख नदी घग्घर है । जो की सरस्वती नदी के नाम से भी जानी जाती थी। सरस्वती वेदो की सबसे पवित्र नदी है। एवं भारत की सबसे प्राचीन भी है। 


1963 में प्रकाश में आया राखीगढ़ी गांव


1963 में पहली बार निजी स्तर पर स्थानीय आचार्य भगवान देव ने जमींदोज विरासत के चिह्नों का पता लगाया। उसी दौरान झज्जर स्थित गुरुकुल के निजी संग्रहालय में यहां से निकले सिक्के और वस्तुएं आदि रखी गई है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसके महत्व को 1997 में समझा और 2000 के बीच तीन बार इस जगह खुदाई भी की।


सात फुट के कंकालों का डीएनए टेस्ट


खुदाई के दौरान यहां कुछ कंकाल भी मिले हैं। जिसमें दो कंकाल करीब सात फुट के हैं जिन्हें दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है। 


अभी तक यहाँ द्रविड़ और आर्य दोनों प्रकार के लोगो का कंकाल प्राप्त किया जा चूका है जिसने वैज्ञानिको को उलझन में डाल रखा है। 


इन सभी के बाद अब हम " वैदिक काल" के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे - वैदिक काल का इतिहास


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