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रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की कथा - भगवान रामेश्वरम की महिमा, कथा और संहार की शक्ति | Rameshwaram Jyotirling Katha | Arulmigu Ramanathaswamy Temple | Rameshwaram Jyotirling Temple



Rameshwaram Jyotirling Temple : भगवान राम, भगवान विष्‍णु के सातवें अवतार थे जिन्‍होंने यहां अपनी पत्‍नी सीता को रावण के चंगुल से बचाने के लिए यहां से श्री लंका तक के लिए एक पुल का निर्माण किया था। वास्‍तव में, रामेश्‍वर का अर्थ होता है 'भगवान राम के ईंश्वर' और इस स्‍थान का नाम, भगवान राम के नाम पर ही रखा गया। यहां स्थित प्रसिद्ध रामनाथस्‍वामी मंदिर, भगवान राम को समर्पित है।



रामेश्वर ज्योर्तिलिंग की पौराणिक कथा 


पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री राम ने अपने चौदह साल के वनवास में कई पुण्य और धर्म के काम किए जिसे हम सुनते चले आ रहे है। श्री राम ने ऐसे ही कई महान काम किए थे। उन्होनें रावण का वध कर उसके राक्षस राज का अंत किया था। जिसके लिए उनका जन्म हुआ था। हिंदू धर्म के ग्रंथों में माना जाता है कि इसके बाद जब प्रभु श्रीराम ने रावण का अंत किया और सीताजी को लेकर वापस आए तो ऋषि-मुनियों ने श्री राम से कहा कि उनपर ब्राहम्ण हत्‍या का पाप लगा है। इसके लिए उन्‍हें पाप मुक्‍त होना पड़ेगा। 


इसके बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के द्वीप पर ब्राहम्‍ण हत्‍या के पाप से मुक्‍त होने के लिए रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्‍थापना करने का विचार किया। उन्होंने हनुमान जी को कैलाश पर्वत पर भेजा जिससे वह उनके लिंग स्वरूप को वहां ला सकें, हनुमान चले भी गए लेकिन उन्‍हें शिवलिंग लेकर लौटने में देर हो गई तो मां सीता ने समुद्र किनारे रेत से ही शिवलिंग की स्‍थापना कर दी। वहीं पवनसुत हनुमान के द्वारा लाए गए शिवलिंग को सीताजी के द्वारा बनाए गए शिवलिंग के पास ही स्‍थापित कर दिया। हनुमान द्वारा लाए गए लिंग को "विश्वलिंग" कहा गया जबकि सीताजी द्वारा बनाये गए लिंग को "रामलिंग" कहा गया। ये दोनों शिवलिंग इस तीर्थ के मुख्य मंदिर में आज भी पूजित हैं। यही मुख्य शिवलिंग ज्योतिर्लिंग है। राम के निर्देशानुसार यह विश्वलिंगम आज भी प्रथम पूजा का ध्यान रखता है। 



पौराणिक ग्रंथों में एक मान्यता भी है कि जब भगवान श्री राम लंका की तरफ युद्ध के लिए आगे बढ़ रहे थे, तब उन्होंनें समुद्र के किनारे अपनी वानर सेना सहित शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा अर्चना की थी। पूजा से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने श्री राम को विजयश्री का आशीर्वाद दिया था। श्री राम ने भोलेनाथ से यह भी अनुरोध किया कि सदैव इस ज्योतिर्लिंग रुप में यहां निवास करें और भक्तों को अपना आशीर्वाद दें। उनकी इस प्रार्थना को भगवान शंकर ने स्वीकार किया और ज्योतिर्लिंग के रूप में यही विराजमान हो गए।


अरुल्मिगु रामानाथास्वमी मंदिर मंदिर का इतिहास 


रामेश्वरम् मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर नमूना है। भारत में प्रमुख चार धाम हैं जो देश के चारों दिशाओं में स्थित हैं, जिनमें एक दक्षिण भारत में स्थित रामेश्वर धाम है। रामेश्वरम चेन्नई से लगभग 683 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में है। जो भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख जैसे का आकार द्वीप है। टापू के दक्षिणी कोने में धनुषकोटि नामक तीर्थ है, यहां भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसके प्रत्येक पथ्तरों पर राम नाम लिख गया ऐसा माना जाता है कि जिन पत्थरों पर राम का नाम लिखा हुआ था वह पानी में नहीं डूबे जिन पर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची व वहां विजय पाई। यह मंदिर क्षेत्र 15 एकड़ में बना हुआ है। इस मंदिर में 12 वीं शताब्दी से विभिन्न शासकों के शासनकाल के दौरान बदलाव आया है। यह अपनी शानदार सुंदरता के लिए जाना जाता है रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे बड़ा गलियारा माना जाता है। यह उत्तर-दक्षिण में 197 मी. एवं पूर्व-पश्चिम 133 मी. है जिसकी चौड़ाई 6 मी. तथा ऊंचाई 9 मी. है। गोपुरम, मंदिर के द्वार से लेकर मंदिर का हर स्तंभ, हर दीवार वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत है।


रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग कहा स्थित है ?


श्रीरामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनाड जिले में है। यहाँ लंका विजय के पश्चात भगवान श्रीराम ने अपने अराध्यदेव शंकर की पूजा की थी। ज्योतिर्लिंग को श्रीरामेश्वर या श्रीरामलिंगेश्वर के नाम से जाना जाता है।


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