पारिजात का वृक्ष लगा लिया तो होंगे 5 चमत्कारिक फायदे - Parijaat Ka Ped | Jasmine Plant in Hindi | Parijaat Ka Phool Benefits



पारिजात के पेड़ को हरसिंगार का पेड़ भी कहा जाता है। इंग्लिश में इसे नाइट जेस्मिन कहते हैं।



1. पारिजात का वृक्ष जिसके भी घर के आसपास होता है उसके घर के सभी तरह के वास्तुदोष दूर हो जाते हैं।


2. पारिजात के फूलों को खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन केवल उन्हीं फूलों का इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं। जहां यह वृक्ष होता है वहां पर साक्षात लक्ष्मी का वास होता है।


3. पारिजात के फूलों की सुगंध आपके जीवन से तनाव हटाकर खुशियां ही खुशियां देती है। इसकी सुगंध आपके मस्तिष्क को शांत कर देती है। घर परिवार में खु‍शी का माहौल बना रहता है और व्यक्ति लंबी आयु प्राप्त करता है।


4. पारिजात के ये अद्भुत फूल सिर्फ रात में ही खिलते हैं और सुबह होते - होते वे सब मुरझा जाते हैं। यह फूल जिसके भी घर-आंगन में खिलते हैं, वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है।


5. हृदय रोगों के लिए हरसिंगार का प्रयोग बेहद लाभकारी है। इस के 15 से 20 फूलों या इसके रस का सेवन करना हृदय रोग से बचाने का असरकारक उपाय है, लेकिन यह उपाय किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह पर ही किया जा सकता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है।



आइये जानते है इसका पौराणिक महत्व : 


उत्तर प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति के पारिजात के चार वृक्षों में से हजारों साल पुराने वृक्ष दो वन विभाग इटावा के परिसर में हैं जो पर्यटकों को 'देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन' के बारे में बताते हैं।


 कहते हैं कि पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी जिसे इंद्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। हरिवंशपुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। 


पौराणिक मान्यता अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और वहां इन्द्र ने उन्हें पारिजात का पुष्प भेंट किया। 


वह पुष्प श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मिणी को दे दिया। देवी सत्यभामा को देवलोक से देवमाता अदिति ने चिरयौवन का आशीर्वाद दिया था। तभी नारदजी आए और सत्यभामा को पारिजात पुष्प के बारे में बताया कि उस पुष्प के प्रभाव से देवी रुक्मिणी भी चिरयौवन हो गई हैं। यह जान सत्यभामा क्रोधित हो गईं और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष लेने की जिद्द करने लगी।


कृष्ण के समझाने पर भी भामा का क्रोध शांत नहीं हुआ और अंत में अपनी पत्नी की जिद के सामने झुकते हुए उन्होंने अपने एक दूत को स्वर्गलोक में परिजात वृक्ष को लाने के लिए भेजा पर उनकी यह मांग पर इंद्र ने इंकार कर दिया और वृक्ष नहीं दिया. 


जब इस बात का संदेश कृष्ण तक पहुंचा तो वे रोष से भर गए और इंद्र पर आक्रमण कर दिया. युद्ध में कृष्ण ने विजय प्राप्त की और इंद्र से परिजात वृक्ष ले आए। इंद्र ने क्रोध में आकर परिजात वृक्ष पर कभी भी फल ना आने का श्राप दिया इसीलिए इस वृक्ष पर कभी भी फल नहीं उगते। 


वादे के अनुसार भगवान कृष्ण ने उस वृक्ष को लाकर सत्यभामा की वाटिका में लगवा दिया। 




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