: राजस्थान के सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे - Unemployment in Rajasthan : Social and Cultural Issues of Rajasthan



देश में जिस तेजी के साथ कोरोना वायरस ने लोगों की सेहत पर चोट की है, उसी तेजी के साथ रोजगार-धंधों को भी आधात पहुंचाया है।


देश में बेरोजगारी की दर पिछले चार महीने की सर्वाधिक अप्रेल में देखने को मिली है। सर्वाधिक 35 फीसदी बेरोजगारी दर हरियाणा में है। जबकि राजस्थान में 28 व दिल्ली में 27.3 फीसदी तक यह दर पहुंच चुकी है।




राजस्थान में बेरोजेगारी दर में उतार-चढ़ाव 


महीना------बेरोजगारी दर (फीसदी में)


जनवरी 2021------ 17.7

फरवरी 2021------- 25.6

मार्च 2021-------- 19.7

अप्रेल 2021-------- 28


अगर बात करें कोरोना महामारी के बाद की तो अब राजस्थान पुरे देश भर में बेरोजगारी के मामले में दूसरे नंबर पर है। 


बेरोजगारी के ताजा आंकड़े राजस्थान के युवाओं के साथ ही हर तबके के लोगों को चिंता बढ़ा रहे हैं. ताजा आंकड़ों के अनुसार 28 फीसदी बेरोजगारी दर के साथ राजस्थान देश में दूसरे पायदान पर पहुंच गया है. राजस्थान के बेरोजगारों का कहना है कि सरकारी नौकरियों के रिक्त पदों पर भर्ती प्रक्रिया को जल्द पूरा करवाकर सरकार को जल्द नियुक्ति देनी चाहिए और स्किल डवलपमेंट के माध्यम से निजी क्षेत्रों में नौकरियों के लिए युवाओं को ट्रेनिंग मुहैया करवानी चाहिए। 


ऐसा नहीं है की कोरोना महामारी से पहले राज्य के हालात सही थे। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, महगाई आदि सभी के कारण पिछले कुछ वर्षो से राज्य में बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। 


सभी राजनीतिक पार्टियों को भी गंभीरता के साथ बेरोजगारी के मुद्दे पर ध्यान देना होगा। युवाओं का विकास होगा तभी देश का विकास संभव है। बेरोजगारी के लगातार बढ़ते आंकड़ों से युवा अवसाद में जा रहा है और कई युवा खुदकुशी करने को मजबूर हैं। राजस्थान में बेरोजगारी अब एक गंभीर समस्या बन चुकी है। लंबे समय से राज्य सरकार के कई विभागों में भर्तियां अटकी हुई हैं। युवाओं से वादे कर उन्हें सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन बेरोजगारों का सपना टूटता नजर आ रहा है। 


अब बेरोजगारी राजस्थान का एक सामाजिक मुद्दा बन चूका है। सरकार को इस और ध्यान देने की काफी आवश्यकता है। नहीं तो आने वाले समय में राज्य में बेरोजगारों की संख्या चार गुना हो जाएंगी, जिसे नियंत्रण करना आसान नहीं होगा। 


भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। लेकिन ऐसे ही हालात रहे तो कहीं ऐसा ना हो कि भारत को बेरोजगारों का देश कहा जाने लगे। अब इसमें सुधार की जरूरत है। सरकारी नौकरियों के साथ ही निजी क्षेत्रों में रोजगार मुहैया करवाने की दिशा में भी सरकार को ध्यान देना होगा। राजनीतिक पार्टियां चुनाव के समय युवाओं से बड़े-बड़े वादे करती हैं। लेकिन उन्हें पूरा नहीं करती। वोट की फसल बटोरने के बाद राजनीतिक पार्टियां युवाओं से किए गए वादे भूल जाती हैं. इस पर चुनाव आयोग को संज्ञान लेना चाहिए। जो पार्टी अपने वादों पर खरा नहीं उतरती हैं। उन पर चुनाव आयोग को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। यह पार्टी विशेष का नहीं बल्कि देश का मामला है। 


 देश में बेरोजगारी दर के लिहाज से राजस्थान का दूसरे नंबर पर आना बहुत ही चिंताजनक है। राज्य सरकार को हरियाणा की तर्ज पर राजस्थान में भी निजी क्षेत्रों में युवाओं को नौकरियां मुहैया करवाने की दिशा में नीति निर्धारण करना चाहिए। सरकारी हो या निजी क्षेत्र पहले राजस्थान के बेरोजगार युवाओं को ज्यादा से ज्यादा मौका मिलना चाहिए। हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी की मांग वह लंबे समय से कर रहे हैं। 


इसके अलावा नौकरियों के संबंध में की गई घोषणाओं को समय पर पूरा करने की मांग भी प्रदेश के बेरोजगारों ने उठाई है. निजी क्षेत्रों में नौकरियों के अवसर मुहैया करवाने के लिए उन्होंने युवाओं के लिए खास ट्रेनिंग मुहैया करवाने की भी मांग उठाई है। सरकारी नौकरी का विज्ञापन जारी होने से नियुक्तियों तक लंबा समय लगने के सवाल पर उन्होंने कहा कि पेपर लीक, फर्जी डिग्री जैसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इसके लिए कड़े कानून बनने चाहिए. कई भर्तियां 2013 से आज तक लंबित हैं। ऐसे में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। गलती करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। 


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