Pitru Paksha: श्राद्ध क्यों बनाए जाते हैं, श्राद्ध कितने प्रकार के होते हैं, श्राद्ध कितने दिन के होते हैं, श्राद्ध किसे कहते हैं, श्राद्ध में पूजा करनी चाहिए, पितर कौन होते है - Shraddha Hindi



Shradh kyu karte hai - अक्सर कई भाई - बहिनों के मन में यह सवाल उठता है की आखिर हिन्दू धर्म के सभी लोग श्राद्ध क्यों बनाते है। यह कितने प्रकार एवं दिन के होते है। पितर क्या होते है। आत्माएं मृत्यु के बाद क्या खाती है। तो ऐसे सभी सवालों का जवाब आज आप सभी को इस लेख में मिल जाएगा। तो चलिए शुरू करते है - Shradh in Hindi



प्रश्न: श्राद्ध किसे कहते हैं ?


उत्तर: श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को प्रसन्न करने से है। सनातन मान्यता के अनुसार जो परिजन अपना देह त्यागकर चले गए हैं, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए सच्ची श्रद्धा के साथ जो तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।


प्रश्न: पितृ श्राद्ध किसे कहते है ?


उत्तर: आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।


प्रश्न: श्राद्ध कितने प्रकार के होते हैं ?


उत्तर: मत्स्य पुराण में त्रिविधं श्राद्ध मुच्यते यानि तीन प्रकार के श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य का उल्लेख मिलता है। यमस्मृति में पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। जिन्हें नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। पर भविष्य पुराण और विश्वामित्र स्मृति द्वादश श्राद्धों यथा, नित्य, नैमित्तिक, काम्यम, वृद्धि, सपिण्ड, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धयर्थ, कर्मांग, तीर्थ, यात्रार्थ और पुष्टि का उल्लेख करती है।


प्रश्न: श्राद्ध क्यों बनाए जाते हैं ? 


उत्तर: श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ (जो श्रद्धा से किया जाये, वह श्राद्ध है।) भावार्थ यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वही श्राद्ध है।


हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं।



प्रश्न: जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध कब होता है?


उत्तर: जिनकी मृत्यु तारीख पता न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है, ऐसा पारंपरिक अवधारणाएं कहती हैं।


प्रश्न: श्राद्ध कितने दिन के होते हैं ?


उत्तर: आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं।



प्रश्न: क्या श्राद्ध में पूजा करनी चाहिए ?


उत्तर: इन दिनों पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूरे विधि-विधान से पूजा पाठ किया जाता है. पितृ दोष दूर करने के लिए भी श्राद्ध पक्ष  (Shraddh paksh) को सबसे अच्छा समय माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में किए गए तर्पण से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है। 


प्रश्न: पितर कौन होते है कहाँ करते हैं ये निवास ?


उत्तर: गरूड़ पुराण  के अनुसार कोई मनुष्य तन धारि जीव जब अपना वह पंचतत्व के शरीर का त्याग करता है तब मृत्यु के पश्चात मृतक व्यक्ति की आत्मा प्रेत रूप में यमलोक की यात्रा शुरू करती है। इस यात्रा के समय उस मृतक की आत्मा को उसके संतान द्वारा प्रदान किये गये पिण्डों से प्रेत योनि वाले उस आत्मा को बल मिलता है।


यमलोक में पहुंचने पर उस प्रेत आत्मा को अपने कर्म के अनुसार प्रेत योनी में ही रहना पड़ता है अथवा अन्य योनी प्रदान कर दी जाती है। कुछ व्यक्ति अपने सद कर्मों से पुण्य अर्जित करके देव लोक के वासी हो जाते है एवं पितृ लोक में स्थान प्राप्त करते हैं यहां अपने योग्य शरीर मिलने तक ऐसी आत्माएं निवास करती हैं।


शास्त्रों में बताया गया है कि चंद्र लोक से ऊपर एक अन्य लोक है जिसे पितर लोक कहते है। शास्त्रों में पितरों को देवताओं के समान पूजनीय बताया गया है। पितरों के दो रूप बताये गये हैं- पहला देव पितर और दूसरा मनुष्य पितर। देव पितर का काम न्याय करना है, देव पितर मनुष्य एवं अन्य जीवों के कर्मो के अनुसार उनका न्याय करते हैं।


प्रश्न: जब श्राद्ध की तिथि-याद ना हो ?


उत्तर: पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है।


शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।



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