राजस्थान में जल संकट : राजस्थान के सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे - Rajasthan Water Crisis : Social and Cultural Issues of Rajasthan



जल संकट राजस्थान की एक गंभीर समस्या है। जल संकट के कारण राजस्थान के पूर्वी भाग में चम्बल, दक्षिणी भाग में माही के अतिरिक्त कोई विशेष जल स्रोत नहीं हैं, जो आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। पश्चिमी भाग तो पूरा रेतीले टीलों से भरा हुआ निर्जल प्रदेश है, जहाँ केवल इन्दिरा गांधी नहर ही एकमात्र आश्रय है। राजस्थान में जल संकट के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं। 


- भूगर्भ के जल का तीव्र गति से दोहन हो रहा है।


- पेयजल के स्रोतों का सिंचाई में प्रयोग होने से संकट गहरा रहा है।


- उद्योगों में जलापूर्ति भी आम लोगों को संकट में डाल रही है।


- पंजाब, हरियाणा आदि पड़ोसी राज्यों का असहयोगात्मक रवैया भी जल–संकट का प्रमुख कारण है।


- राजस्थान की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है कि वर्षा की कमी रहती है।



निवारण हेतु उपाय 


- राजस्थान में जल–संकट के निवारण हेतु युद्ध–स्तर पर प्रयास होने चाहिए अन्यथा यहाँ घोर संकट उपस्थित हो सकता है। कुछ प्रमुख सुझाव इस प्रकार हैं


- भू–गर्भ के जल का असीमित दोहन रोका जाना चाहिए।


- पेयजल के जो स्रोत हैं, उनका सिंचाई हेतु उपयोग न किया जाये।


- वर्षा के जल को रोकने हेतु छोटे बाँधों का निर्माण किया जाये।


- पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश की सरकारों से मित्रतापूर्वक व्यवहार रखकर आवश्यक मात्रा में जल प्राप्त किया जाये।


- गाँवों में तालाब, पोखर, कुआँ आदि को विकसित कर बढ़ावा दिया जाये।


- मरुस्थल में वृक्षारोपण पर विशेष ध्यान दिया जाये।


- खनन–कार्य के कारण भी जल–स्तर गिर रहा है, अतः इस ओर भी ध्यान अपेक्षित है।


- पहाड़ों पर वृक्ष उगाकर तथा स्थान–स्थान पर एनीकट बनाकर वर्षा–जल को रोकने के उपाय करने चाहिए।


- हर खेत पर गड्ढे बनाकर भू–गर्भ जल का पुनर्भरण किया जाना चाहिए ताकि भू–गर्भ जल का पेयजल और सिंचाई के लिए उपयोग किया जा सके।


अपनी प्राकृतिक संरचना के कारण राजस्थान सदैव ही जलाभाव से पीड़ित रहा है। किन्तु मानवीय प्रमाद ने इस संकट को और अधिक भयावह बना दिया है। पिछले वर्षों में राजस्थान में आई अभूतपूर्व बाढ़ ने जल–प्रबन्धन के विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है। यदि वह बाढ़ केवल एक अपवाद बनकर रह जाती है तो ठीक है. लेकिन यदि इसकी पुनरावृत्ति होती है तो जल–प्रबन्धन पर नये सिरे से विचार करना होगा।


कुओं-तालाबों का जीर्णोद्धार करवाया जाए देश में ग्रामीण क्षेत्रों में जल समस्या की विकट स्थिति है। राजस्थान के जालौर जिले के रानीवाड़ा के धोरों में प्यास से 6 साल की मासूम बालिका की मौत हो गई। गांव में हैंडपंपों में जल स्तर काफी नीचे चला गया है या रीत गया है। तालाब, बावड़ी व कुएं सूखे पड़े हैं या निम्न जल स्तर है, जो मानव व पशु-पक्षियों की पहुंच से दूर है। इनके जीर्णोद्धार का कार्य सरकार एवं जन सहयोग से पूरा करना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में नदियों पर एनीकट बनाकर नदियों के गहराई वाले पानी को लिफ्ट करके 35 - 40 गांव की सामूहिक पेयजल योजनाएं बनाई जानी चाहिए। लोगों को जल संरक्षण के बारे में जागरूक करना चाहिए।


अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाकर उनका संरक्षण करना चाहिए, ताकि वायुमंडल में नमी होने पर बादल आकर्षित होकर वर्षा करें। जल प्रदूषण नहीं होना चाहिए। घरों में स्नान करते समय बाल्टी का प्रयोग करें। टूथब्रश के समय नल की टोटी को कम खोलें या मग के पानी का उपयोग करें। खेतों की सिंचाई उचित प्रबंधन से हो। वाहनों को धोने की बजाय, किसी पात्र में पानी लेकर कपड़े से पोंछे। आवश्यक नहीं होने पर समय पर बिजली की मोटर को बंद कर दें। सार्वजनिक नलों को चालू करने के बाद बंद नहीं करते, पानी व्यर्थ चला जाता है। यह प्रवृत्ति बदलनी होगी। वाटर हार्वेस्टिंग द्वारा जल संचय की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि भूगर्भीय जलस्तर बढ़े। वर्षा का पानी किसान अपने खेत के किसी हिस्से में इकट्ठा कर सकता है।


जल है तो कल है। यदि हमें कल देखना है, तो उसकी शुरुआत हमें आज से ही करनी होगी। जल संकट को कम करने के लिए हमें पानी की बर्बादी, जल बाहुल्य क्षेत्र में अत्यधिक पानी की सप्लाई को तथा अंधाधुंध अनियंत्रित भूजल दोहन के लिए बोरिंग बनाने पर रोक लगानी होगी। साथ ही रसोई घर के पानी को घर के मिट्टी युक्त कच्चे स्थानों पर निस्तारण करना होगा। घर में यदि एसी, आरओ और ऑटोमेटिक वॉशिंग मशीन है, तो उससे निकलने वाले पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। वर्षा जल व्यर्थ न जाए, इसका ध्यान रखना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में सामुदायिक जल प्रबंधन कार्यक्रम तथा ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देकर और तालाब, ताल तलैया आदि का निर्माण कर हम भूमिगत जल स्तर में वृद्धि कर सकते हैं।


गिरते भूजल की स्थिति से निपटने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का भी प्रयोग अधिक से अधिक करना चाहिए और जन जागरूकता अभियान के साथ अत्यधिक वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना चाहिए। कपड़ों की बर्बादी कम से कम करनी होगी, क्योंकि इनके निर्माण में बहुत अधिक जल का प्रयोग होता है। हमें अपनी पारंपरिक तथा प्राकृतिक अवधारणा के साथ जल स्रोतों का संरक्षण करना चाहिए।


समय आ गया है कि अब हम वर्षा का जल अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें, क्योंकि जल का कोई विकल्प नहीं है। इसकी एक-एक बूंद अमृत है। आधारभूत जल संकट की समस्या के समाधान के लिए अधिक दक्ष सिंचाई पद्धतियों को अपनाने की आवश्यकता हैं। रेन वाटर हार्वेस्टिंग द्वारा जल का संचयन किया जाना चाहिए। वर्षा जल को सतह पर संग्रहित करने के लिए टैंकों, तालाबों और चेक डैम आदि की व्यवस्था किया जाना चाहिए। झीलों, नदियों और समुद्र जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण करके जल संकट की समस्या से निपटा जा सकता है।


पानी की समस्या सिर्फ राजस्थान में नहीं, बल्कि पूरे देश में है. एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट से गुजर रहे हैं. 20 साल में ये आंकड़ा 140 करोड़ तक पहुंच सकता है. देश की 40 फीसदी आबादी अभी भी सूखाग्रस्त इलाके में रहती है। 


अब जल्द से जल्द आम लोगों को और सरकार को इस और ध्यान देना ही होगा अन्यथा इसमें बहुत देर हो जाएगी और पूरा राज्य जल संकट की चपेट में आ जाएगा। 


यह भी पढ़े : राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाएं : राजस्थान के सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे



No comments:

Post a Comment